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s.p. singh


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“विक्रम और बेताल”

Posted On: 12 Nov, 2015  
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social issues में

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एक वकील की फितरत ??????(दलील)

Posted On: 30 Oct, 2015  
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social issues में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

मान्यवर सश्री सिंग जी सादर नमस्कार. यह प्रशंसनीय है कि आप कश्मीर समस्या के बारे में चिन्तितहैं और इसका सम्मानमानजनक हल चाहते है. आज़ादी से लेकर आज तक नेहरू जी और गाँधी जी नें अनगिनत प्रयत्न किये. गाँधी जी बढ़कर दुनिया में पाकिस्तान, मुसलमानों और कश्मीरियों का असली हितैषी कौन हो सकता है. लेकिन सभी प्रयासों के बाद भी हम कश्मीरियों का दिल नहीं जीत पाए. जहां इतने बड़े बड़े युग पुरुष असफल हो गए वहाँ मैं नहीं समझता हूँ अन्य कोई सफल होगा. मैं नहीं समझता कि पाकिस्तान का दिल जीतने के लिए हम और क्या कर सकते हैं. आपका कहना कि जनतंत्र कि स्थापना के लिए जम्मू कश्मीर विधानसभा को भग करके दुबारा चुनाव कराये जांय.यह मुझे oversimplification लगता है. चुनाव तो हमारे democratic process का सबसे महत्वपुर्ण अंग है. चुनाव तो निश्चित अवधि के लिए निश्चित समय पर होते ही हैं. फिर भी कश्मीरी उग्रवादियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. मेरे विचार में two nation theory और जिहाद कश्मीर सहित सभी विश्व शांति के लिए खतरा है.जबतक जिहाद कायम है जम्मू और कश्मीर समस्या का समाधान सम्भव नहीं है.

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

आदरणीय महानुभव, आपकी भी वाही समस्या है जो बाकी भक्तों की है, जो ६९ वर्षो की दुर्दशा आप बता रहे है वैसा भी नहीं था देश, वह बात सही है की सरकार के स्तर पर उजागर किये गए कुछ भ्रषटाचार की कहानी बहुत प्रचारित की गई , लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन एक शुभ लक्षण है नहीं तो देश के नेता तानाशाह बन जाते है . मेरा केवल इतना कहना है की शायद आपने कभी रेल में सफर नहीं किया होगा कभी रेल की साधारण बोगी में मेरठ से लखनऊ तक का सफर करे ? आप ही बता दीजिये की देश में भ्रष्टाचार कहाँ समाप्त हुआ है? अगर सरकार ने दो वर्ष में कुछ में काम किया है तो वह तो साक्षात् सब को दिखाई देगा मन लो किसी दिव्यांग को नहीं दिखेगा लेकिन सर्वांग को तो सब कुछ दिखेगा तो फिर ढोल बज कर बताने की जरूरत क्या है / हमारी तो इच्छा है की भक्तों के भगवन मोदी जी इस देश पर सौ वर्ष तक शासन करे ?

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

आदरणीय एस पी सिंह साहब, सादर अभिवादन! आपने अच्छा व्यंग्य साधा है. मैंने भी लिखा है जय श्री राम से भारत मत की जय तक. दरअसल भाजपा की स्ट्रेटेजी समयानुसार बदलती रहती है. दूसरी तरफ विपक्ष में मोदी जी के कद का कोई नेता अभी नहीं दीख रहा, नीतीश कुमार को लोग आगे लाने का प्रयास कर रहा है पर नीतीश कुमार का भाषण मोदी जी के जैसा दमदार नहीं होता इसी लिए अभी सर्व ग्राह्य बनने में वक्त लगेगा. बिहार को वे अगली श्रेणी में लेन के लिए प्रयासरत हैं. शराब बंदी एक बहुत बड़ा आंदोलन है जिसे नितीश कुमार ने चुनौती के साथ बंद करा दिया है. आगे क्या होगा नहीं मालूम,पर अगर वे इसमें सफल होते हैं तो वे भी एक हैसियत वाले नेता बन जाएंगे. उनका भी काम बोलता है... तब तक मोदी जी और उनके भक्तों को झेलिये ...अगर मोदी जी भी कुछ कर दिखते हैं तो जनता जरूर उनको दुबारा चुनेगी वरना.... ऑप्शन तो हमेशा खुला रहता है. राहुल जी अभी अपने आपको पूर्ण विकसित नेता के रूप में उभरने में असफल सिद्ध हो रहे हैं ...आगे आगे देखिये होता है क्या? पांच राज्यों के चुनाव परिणाम भी बताएँगे, मोदी जी की विश्वसनीयता बरक़रार है या कुछ कम हुई है. सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

नमस्कार सिंग साहब थोडा चिंतन करोगे तो समज में आयेगा कि भारत की जनता के साथ बहुत बडा खेल खेला गया है । शरीफ आदमी डरता नही है, भ्रष्ट को अनेक तरह के डर सताते हैं, आधाअधुरा भ्रष्ट भी डर और आत्मग्लानि से पिडित रहता है । राज्यकर्ताओं को निडर और कमाई के मामले में मजबूत नागरिकों की जरूरत नही थी । भले भ्रष्ट लेकिन डरे हुए नागरिकों की जरूरत थी, ऐसे नागरिक कभी सरकार के विरुध्ध खडे नही होते । नागरिकों के भ्रष्ट बनाने का शुरु हुआ १९६० के दशक में, हथियार बनाया इन्कम टेक्स को । टेक्स रेट ९६ प्रतिशत जीतना उंचा ले गये । हुआ ये कि १०० मे से ९६ सरकार को देने के बाद नागरिक के पास ४ रूपये बच जाते थे । नागरिक के पास दो ही रास्ते थे । ५ हजार तक छुट थी इस के उपर की आय में मात्र ४ पतिशत रूपये के खातिक कडी मेहन करना छोड दे और ५ हजार में ही संतोष करले या तो कमाई का हिसाब ही ना बताए । होग यी गोरे और कालेधन की खोज, उसकी व्याख्या । १९७० आते आते जनता को भी मालुम हो गया कि कालाधन भी होता है । पहले चोरी का धन होता था, कालेधन के बारेमें ताजा खबर थी । बाद के सालों में धीरे धीरे टेक्स रेट घटाते गये, अभी तो बहुत कम है लेकिन दो पिढियों को भ्रष्ट बना दिया है । कमाने में सक्षम हो ऐसे नागरिक वर्ग को आत्मग्लानि और डर के घेरे में ले लिया है । ऐसे नागरिक कभी भी सरकार के खिलाफ खडे नही होते । गरीबों की चिंता नही, भले गरीब शरीफ हो ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

सिंह साहब .........कम जानकारी अकसर समस्या खड़ी कर देती है ! श्री मती स्मृति जुबिन ईरानी पहले से राज्य सभा सांसद हैं अतः आपको कोई परेशान होने की जरुरत नहीं है ! रही बात मालपुए और पड़े लिखों की तो कॉंगेश से तो ठीक ही हैं .......एक भ्रष्ट और कम अक्ल परिवार पैसों की दम पर गद्दी पर बैठा था और पढ़े लिखे उनके नौकर सरकारी पिट्ठू बन कर जनता का खून चूस रहे थे...... कांग्रेस ने जब ज्ञानी जेल सिंह को राष्ट्रपति बना सकती है फिर ये तो एक केबिनेट मंत्री है क्या समस्या है ? मनमोहन सिंह भी तो कभी इलेक्शन नहीं जीते और पढ़े लिखे होने के बाद भी एक अनपढ़ के गुलाम बने रहे ,,,,क्या फायदा .....? आम चूसो गुठली न गिनो ........फिर आपकी मर्जी !

के द्वारा: dhirchauhan72 dhirchauhan72

swargiya pradhanmantri rajiv gandhi ne panchayati raj byavastha ko na keval punarjivit kiya apitu sthaitva pradan karne ka v prayas kiya. desh me sanvidhan ke 73 tatha 74 ve sansodhano ke madhyam se मृतप्राय पंचायतो को जीवन प्रदान किया गया तथा संवेधानिक दर्ज दिए जाने की वजह से इनका अस्तित्व भी सुरछित हो गया है.इन संशोधनों के कारन इन पंचायतो को prasasanik अधिकार प्राप्त होने के साथ ही वित्तीय संसाधनो की गररन्ति प्राप्त हो गई ह. निर्विवाद रूप से yah तथ्य सत्य ह की वित्तीय रूप से ससक्त व स्वावलम्बी होने पर ही पंचायती राज ब्यवस्था का ग्रामीण विकास me shaskt व prabhavi योगदान सुनिश्चित करना sambhav है.पंचायती राज ब्यवस्था वास्तविक अर्थो me tabhi सफल हो पाएगाजब गाँवो me sikchha व साछरता ई रोसनी फैलेगी, ग्रामीण जन संकीर्ण bhavnao ,tuchha स्वार्थो व डॉगटराजनीति से ऊपर उठकर व्यापक सोच व चिंतन koapnane hetu gramo के विकास को सर्वोच्च वरीयता प्रदान करेंगे.

के द्वारा:

Dear Mr. Singh By reading your article and reply, it is observed you also jumped on the evidences given by congress and deliberately not acknowledged the facts brought up by Gujrat Govt. There are various other issues on which "half truth" is being said but you chose to keep quite, eg. 1. Land was given to Adani @ 1/- per meter in Gujrat. It might be correct, but congress govt, gave @ 20 paise per meter, and this fact has not been raised. 2. In snoop gate also, central govt, has said that they are not going to enquiry and still rahul gandhi is raising the same issues. There are so many to say, but of few is 1. Hindus were and are biggest enemy of their own. This society is not going to exists in next 100-200 years. We have seen one division in 1947, and another division is inevitable. That division will also be on the ground of religion. moment, muslims are 35-40% of this country population, they will rake two nation theory again, and congress will once again agree to division. People like you will not go to new nation for muslims but remain with hindus and cut the root of hindus again to prepare ground for another division. 2. There is only one state, which is muslim majority, and there are lot of problems in that state. you people alway support their acts and try to convince the majority that if you want secular india, you must bear kashmir atrocites. you people have not done anything for kashmiri pandits but do lot of crying of philisteen. 3. Hindus are being persecuted not only in Pakistan and Bangladesh, but in India. We are the biggest persecuted religion in the world, and alas, our own community members are those who do it. if you are so convinced that secularism is very good, pls go and live in kashmir to develop it. manish

के द्वारा:

नमस्कार सिंह साहब ...आप आगरा से हो....? ........आप भी वही लिखते हो जो देखते हो ..........सुनते हो ! मेरी भाषा से आप पहले से परिचित हो इसीलिए माफ़ करना ! अपने यहां कहावत है सूप बोले तो बोले ...छलनी भी बोले जामे ७२ छेद.........सुनी है.......? जाति पर व्याख्यान देने से पहले अपने कोंग्रेसी रिश्तेदारों की जातियों का भी सोच लिया करो ....? सब कोंग्रेसियों की माँ किस खानदान से हैं ....? क्या इन विदेशियों को को कोई अधिकार है भारतियों से वोट मांगने का ....? या भारत पर राज करने का ....? रही बात आप कौन से सिंह हो पता नहीं लेकिन मैं क्षत्रिय हूँ और हिन्दू हूँ और मुझे जातियों के बारे में पता है ......मोदी तेली जात से है और हमारे उत्तर प्रदेश में इनका छुआ पानी भी ब्रह्मिण समाज के लोग नहीं पीते हैं और ओ बी सी केटेगरी में आज से नहीं सालों से हैं ........थू थू मोदी की नहीं दिग्विजय सिंह की हो रही है जो एक खानदानी छिछोरा है और इसका इतिहास भी बहुत गंदा है ......!

के द्वारा: dhirchauhan72 dhirchauhan72

अगर महिलाओं के प्रति सम्मान मोदी जी में न होता तो दिल्ली की तरह गुजरात में भी बलात्कार हो रहे होते ........जैसे कोंग्रेश को एक परिवार ने खरीद लिया और एक दूकान की तरह भारत को बना रखा है ! गुजरात ने अपनी एक पहचान बनाई है जहां सड़क बिजली पानी और सुरक्षा की समस्या नहीं है और गुजरात सिर्फ गुजरात को ही नहीं पूरे देश को रोजगार दे रहा है .........और कोंग्रेश मनरेगा दे कर पूरे भारत को मजदूर बना रही है ऊपर से उसमें भी भ्रष्टाचार ! जिनकी ज़ात धर्म का नहीं पता वो शादी जैसी पवित्र संस्कार के विषय में न ही सोचें तो अच्छा है ......... अंग्रेजों के बनाये क्लब को राजनितिक पार्टी जिसके सिद्धांतों में सिर्फ गांधी परिवार की पूजा होती हो ....जो वोट के चक्कर में अपना असली नाम तक नहीं बता सकते ऐसे भ्रष्ट लोग मोदी की पैरों की धुल के बराबर भी नहीं हैं ! क्या कोई कॉंग्रेषी मुझे बता सकता है की ये नेहरू परिवार गांधी क्यों लिखता है क्या रिस्ता है गांधी का इनसे ....? और अगर है बाकी परिवार वाले क्यों आप (आम आदमी पार्टी) के टिकिट पर चुनाव लड़ रहे हैं ....? बाकी सब मान भी लेते चलो कोई बात नहीं ६७ सालों में बिजली और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं को देश को नहीं दे सके और बातें करते हो ...? एक अर्धविकसित व्यक्ति को भारत पे थोपने का जो षड़यंत्र कोंग्रेश ने चला रखा है वो कभी सफल नहीं हो सकता ! एक सलाह भी आपको दे दू भाषा से कोई फर्क नहीं पड़ता बुद्धि बहुत जरुरी है वो भी आदमी की ........दम हिलाने की आदत शिक्षा पाने से नहीं अशिक्षा की वजह से होती है ...... मुसलामानों के हितैसी बन कर जो फोटो पोस्ट में लगा रखा है तुम्हारी कोंग्रेश सरकार 10 साल शासन में रह कर भी इनको इन्साफ नहीं दिला पायी ऐसी सरकार को तो लात मार कर गिरा देना चाहिए ! गांधी , इंदिरा गांधी , राजीव गांधी इन्हें किसी आतंकी ने नहीं अपने ही देश के लोगों ने मारा है ये कोई शहीद नहीं है जो आप लोग गाना चलाये रहते हैं ! शहीद वो जिनके सर काट कर पाकिस्तान में फुटबॉल खेली जाती है है और हमारी सरकार जबाब भी नहीं देती जिसे नपुंसक कहा जाए तो अच्छा है ....मोदी को नहीं अटैक होने से पहले आतंकवादियों को ढेर करने का काम किया है मोदी ने .....और कोंग्रेशी उसे मुसलामानों का दुश्मन बताते है ......? शर्म नहीं आती ? सीबीआई को तोता बना के रखा है जो की सुप्रीम कोर्ट ने कहा है उसके दम पर भी कुछ साबित नहीं कर पाये तो आई बी को भी लपेटने की कोशिश में लगे रहने वाले देश के दुश्मनो चुल्लू भर पानी में डूब मारो .....बम्बई में शहीदों की गलतिया बताने वाले दिग्विजय जैसे लोगों को पार्टी प्रवक्ता बना दिया जाता है ....? ये पोस्ट जो लिखते हो ये अपने लिए अगर लिखते हो अपनी कापी ले कर लिखा करो नहीं तो झेलने के लिए तैयार भी रहा करो ! नमस्ते ...जयहिंद

के द्वारा: dhirchauhan72 dhirchauhan72

राजनीति मॆ उतरते मुसलिम नेता लॊकसभा चुनॉव की सरगर्मिय़ॉ तेज़ हॊते ही मुसलिम माैलवियाे के बयान भी चरम सीमा पर है । नेकी की राह चलवाने वाले बुराई से दुर रखने वाले अाज खुद ही राजनिति का दॉमन थाम कर राजनिति मे कूद पडे है। हदीसो को अपने मफाद के लिय़े सुनाते है। जहा अपना फायदा दिखता वहॉ हदीस याद अाती है। जैसे के एक ज़ाकिर माैलाना कलबे जवाद ने कहा कि अगर इस पार्टी को वोट किया तो बॉरवे इमाम को बुरा लगे़गा। अाैर दूसरी पार्टी को वोट किया तो कल किसी दुसरे माैलवी को बुरा लगेगा। अरे जनाब कब तक बेवकूफ बनायेगे। मै अाप से पुछना चाहता हू कि अाप ने काैन सा ऐसा काम किया है जिस से इमाम खुश होगे पहले अाप जिस लिबास को पहन कर नेतागिरि कर रहे है उस लिबास की अहमियत को पहचने। अाप को नेतगिरि करनी है तो करे नेतगिरि लेकिन मज़हब अौर इमाम को साथ लेकर नही माैलना ।अाप सिर्फ ज़किर है शिया धर्म गुरू नही धर्म गुरु ईरान वा ईराक मे मौजूद है । रही बात शिया वोट की तो ये उनका अधिकार है के वो किस को वोट करे अाैर किस को नही अब हर कोई जागरूक उसे पता है किस पाटी को वोट करने से फायदा होगा अौर किस से नुकसान । मुसिलमो की इतनी फिक् है तो उतरे राजनिति मे बनाये अपनी पार्टी ....करे मुसलिमो के लिए कुछ मगर जो मज़ा काैम को साथ लेकर राजनिति से मिलेगा वाे मज़ा अकेले मे राजनिति मे कहा-अखिर बात मे यही कहना चाहता हू कि अपनी राजनिति मे इमाम वा मज़हब के नाम का सहारा ना ले बदं करे अपनी राजनिति

के द्वारा:

के द्वारा:

हमारा देश विभिन्न संस्कृतियों का देश है जो समूचे विश्व में अपनी एक अलग पहचान रखता है। अलग-अलग संस्कृति और भाषाएं होते हुए भी हम सभी एक सूत्र में बंधे हुए हैं तथा राष्ट्र की एकता व अखंडता को अक्षुण्ण रखने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। FILE संगठन ही सभी शक्तियों की जड़ है,एकता के बल पर ही अनेक राष्ट्रों का निर्माण हुआ है,प्रत्येक वर्ग में एकता के बिना देश कदापि उन्नति नहीं कर सकता। एकता में महान शक्ति है। एकता के बल पर बलवान शत्रु को भी पराजित किया जा सकता है। राष्ट्रीय एकता का मतलब ही होता है, राष्ट्र के सब घटकों में भिन्न-भिन्न विचारों और विभिन्न आस्थाओं के होते हुए भी आपसी प्रेम, एकता और भाईचारे का बना रहना। राष्ट्रीय एकता में केवल शारीरिक समीपता ही महत्वपूर्ण नहीं होती बल्कि उसमें मानसिक,बौद्धिक, वैचारिक और भावात्मक निकटता की समानता आवश्यक है।

के द्वारा:

मेरे प्यारे भाइयो,दोस्तों,बहनो को मेरा आदर मैंने एक घोषणा पत्र तैयार किया है आपको कैसा लगा कृपया मुझे बताइये कैसा लगा १. गरीवो क लिए मुफ्त चिकित्सा ब्यबस्था करना २. महिलाओ कि सुरक्षा कइ लिए बिशेष ब्यबस्था पर जोर देना ३. भारत में अधिक से बिश्वबिधालय ब मेडिकल कॉलेज बनाना ताकि ज्यादा से ज्यादा स्टूडेंट शिक्षित हो सके तथा मेडिकल शीटों को बढ़ाया जाये ४. योग्यता के आधार पर तथा शिक्षित सांसदो को ही मंत्री पद दिया जाये ५. छोटे उधोगो को बढ़ावा दिया जाये ६. हर साल सरकारी नौकरी अधिक स अधिक निकाली जाये ताकि बेरोजगारी न बड़ाई जा सके ७. हर गांव में २ सरकारी डॉक्टर होने चाइये ८. स्कूल से लेकर कॉलेज तक खेलो में बढ़ावा देना चाइये ९. पुलिस पर से राजनेताओ का दवाव हटा होना चाइये तथा न किसी राजनेता कि रोकटोक होनी चाइये १०. किसानो को २४ घंटे मुफ्त बिजली कि सुबिधा ११. भारत के बड़े राज्यो को छोटा कर देना चाइये ताकि उनका विकास हो सके १२. महिलाओ को ५०% आरक्षण हो ताकि हर क्षेत्र में महिलाये जा सके १३. हर ३ गांव में एक इंटर कॉलेज कि सुबिधा तथा हर १० गांव में एक डिग्री कॉलेज बनाया जाये १४. हर २ जिलो पर एक बिश्व बिधालय होना चाइये १५. हर गांव में एक पुलिस चोकी होनी चाइये १६. संसद को जरूरत पड़ने पर ही बुलाया जाये तथा उसे ५ दिन के अंदर ही निपटाया जाये ताकि फिजूल खर्चे न बड़ा सके १७. देश को भ्रष्टयचार मुफ्त देश बनाने कोसिस करनी चाइये धन्यबाद

के द्वारा:

के द्वारा:

आदरणीय सिंह साहब, सादर अभिवादन! दिन के उजाले में घोर अँधेरा छानेवाला है ..क्या करेंगे जब सारा मीडिया, सारा देश, और अब राम विलास पासवान, करुणा निधि, कांग्रेस के जगदम्बिका पाल सभी उसी की छत्रछाया में आश्रय ढूढ़ते नजर आयें तो कौन क्या कर लेगा ...अब तो जनता के सद्विवेक पर ही निर्भर करता है कि आगामी लोक सभा के चुनाव का परिणाम क्या आने वाला है. केजरीवाल अगर कुछ बोलता है तो सारा मीडिया और सभी राजनीतिक दल जिसमे भाजपा प्रमुख है उसके पीछे लग जाते हैं उसे पलटू, खांसीवाल, खुजलीवाल, एडा ...और न जाने क्या क्या उपाधियों से नवाजने लगते हैं जबकि मोदी की गलती और झूठ को भी सच साबित करने में यही लोग लगे हैं.... खैर आपका और हमारा काम है जन जागृति करना और वे तो अपना काम कर ही रहे हैं.....सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

बंधुवर आपने पूंछा है कि मैं सरदार पटेल को सांप्रदायिक मानता हूँ यह सैकुलर तो महोदया मेरा जवाब है सरदार जिस समय देश के गृह मंत्री और उपप्रधान मंत्री बने वह संक्रमण काल था आजादी मिलने के बाद शासन के तौर तरीकों से अनभिज्ञ लेकिन जिस प्रकार उन्होंने आर एस एस पर गांधी जी कि जघन्य हत्या के बाद प्रतिबंध लगाया था और जिस प्रकार ५६५ देसी राजाओं की अक्ल ठिकाने लगाईं थी वह कार्य केवल और केवल सरदार पटेल ही कर पाये थे इस लिए मैं तो सरदार को केवल एक देश भक्त नेता के रूप में मानता हूँ ? या बात तो आप श्री नरेंद्र मोदी और श्री अडवाणी के क्रिया कलाप से जानो कि वह क्या कहते है एक देश भक्त के विषय ? बाकी कि बाते आपको चार दिसंबर के बाद स्व्यं ही मालुम हो जाएँगी ?

के द्वारा:

प्रिया कुलश्रेष्ठ जी आपकी टिप्प्णी का स्वागत एवं आभार , प्रिया बंधू आपने मेरे मंतव्य का अर्थ ही जब उल्टा लगया है तो मैं जवाब ही क्या दूँ. ? न तो मैं श्री मोदी के रस्ते में हूँ और न श्री अडवाणी के मैंने केवल तथ्यों को रखा है जो मेरे अपने विचार हैं वह भी तथ्यों के आधार अगर वह गलत है तो आप बताएं ? आप इसको केवल राजनितिक विश्लेषण के तौर पर ही देखें दिल से न लगाएं ? भाई कुलश्रेष्ठ जी मैंने लिखा है " श्री अडवाणी और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है अभी कुछ समय पहले भी उनके लाख विरोध के बाद भी उनकी पार्टी ने प्रधान मंत्री पद के उम्मेदवार का ऐलान कर ही दिया था । अब शायद ऐसा लगता है कि मोदी के बढ़ते हुए कद को देखते हुए उन्हें अपना भविष्य ही अंधकारमय लगने लगा है और इसीलिए उन्होंने मोदी के आइडल पुरुष श्री सरदार पटेल ( लोह्पुरुष ) को साम्प्रदायिक ठहराने के लिए ही स्व० नेहरू का ही सहारा क्यों न लेना पड़ा हो । और एक तीर से दो शिकार करने के लिए शब्द बाणो को छोड़ ही दिया है । और ऐसा कह कर उन्होंने जहां एक ओर अपने मन की पीड़ा कही है दूसरी ओर उन्होंने मोदी के मुंह पर एक तमाचा भी जड़ दिया है ! जो लौह पुरुष का आवरण ओढ़ना चाहते थे । ऐसा कह कर उन्होंने मोदी को यह सन्देश भी दिया है कि जिस व्यक्ति को वह अपना आदर्श बनाना चाहते है वह एक साम्प्रदायिक व्यक्ति था ? जब कि आजकल मोदी अपनी सैकुलर छवि का विस्तार करने के लिए बुरका और टोपी को तरजीह देने में लगे हुए है ऐसे में विवाद क्यों. ?" क्या यह सब गलत है अगर यह गलत है तो सही आप बताये - बंधुबर प्रत्यक्ष से मुंह छुपाना नहीं चाहिए ? आपका धन्यवाद.

के द्वारा:

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

भाई गुरु जी आपने स्व्यं ही सिद्ध कर दिया है अपने विचारों से - मैंने केवल तुलना कि है अपराध कि पहले किसने क्या किया क्या नहीं किया यह सब कुछ लोगों को याद है और एक न भुलाया जाने वाला इतिहास भी बन चूका है ? लेकिन क्या आपने कभी इस प्रकार कि तुलना कि है ya विचार भी किया है शायद नहीं ? सिखों के नरसंहार के बाद राजीव सहित बहुत से लोगों का क़त्ल भी इस desh में ही हुआ है इंदिरा कि हत्या भी सिक्खों ने ही कि थी लेकिन क्या किसी राजनितिक अपराधी को और साधारण अपराधी को एक ही सजा मिलती है मेरा केवल यही kahana है - जो आपको सरकार banaane कि or kheench ले गया ? क्योंकि सब बुराई कि जड़ में केवल राजनीती और राजनेता ही है ? तो फिर हम बात भी तो उसी विषय में करेंगे - क्योंकि dudh का dhula कोई neta नहीं है न कोई राजनितिक पार्टी ? आपके विचारों और tippni के लिए धयवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

आदरणीय एस पी सिंह जी,लेख में आप ने अपने विचार व्यक्त किये हैं और लोकतंत्र में सबको अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता है.किसी के विचारों से हम सहमत भी होते हैं और नहीं भी होते हैं.आप के कुछ विचारों से मै सहमत हूँ,परन्तु कुछ विचारों से सहमत नहीं हूँ.आप मोदी को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं.मै किसी पार्टी का सदस्य नहीं हूँ,परन्तु किष्पक्ष रूप से आप से पूछना चाहूंगा की वो कौन सी पार्टी है,जिसके शासनकाल में दंगे नहीं हुए हैं?क्या कांगेस के शासनकाल में १९८४ में सिक्खों के खिलाफ हुए दंगों को कोई भुला सकता है,जो गुजरात के दंगे से कहीं ज्यादा भयानक और बर्बर था.अभी मुज्जफरनगर में दंगे हुए हैं.कई और प्रदेशों में भी दंगे हुए हैं.आप कह रहे हैं की प्रधानमंत्री बनाने के लिए मोदी जनता की गाढ़ी कमाई का करोड़ों रुपया बर्बाद कर रहे हैं और षड़यंत्र कर रहे हैं.राहुल गांधी और अन्य दुसरे नेता भी तो वही काम कर रहे हैं.आप ने उनकी चर्चा क्यों नहीं की?कांगेस के शासनकाल में भ्रस्टाचार और घोटालों में जनता की अरबों-खरबों रुपयों की खून पसीने की कमाई लुटी गई है,कांगेस और उसके सहयोगी दलों के कई नेता अभी भी भ्रस्टाचार और घोटालों के आरोपों में जेलों में बंद हैं.मोदी यदि दोषी हैं तो कोंग्रेस उन्हें जेल में क्यों नहीं डाल देती है?कांग्रेस उनको विशेष सुरक्षा दी हुई है.हम आप भले ही अपने नजरिये से नेताओं को देंखे,लेकिन नेताओं में आपस में बड़ी एकता है.वो खुद कहते हैं की राजनीती में कोई किसी का दोस्त और दुश्मन नहीं होता है.हो सकता है की चुनाव बाद ऐसे गठबंधन की सर्कार दिखे की जनता हैरान हो जाये.धर्म और जाति विशेष की नजरों से देखेंगे तो हर राजनितिक पार्टी किसी न किसी धर्म और जाति विशेष की नजरों में अपराधी है.इस देश में मुस्लिम ही नहीं हिन्दू और सिक्ख भी रहते हैं,जो बड़ी संख्या में दंगों में मारे गए हैं.उनकी तरफ भी निगाह डालना चाहिए.ये सब राजनीतिक चर्चा हुई.आप ने अपने विचार रखे और मैंने अपने.अंत में अपने सदर प्रेम व् शुभकामनाओं सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा:

एक उड़ती खबर के अनुसार पटना में नमो चाय की दुकान से नमो के प्याले चाय पीते हुए गिरिराज बाबु और सुशील बाबु आपस में बतिया रहे थे - का रे सुशील हम लोग इतना मिहनत कर रहे हैं - ई नमो जब प्रधान मंत्री बन जाएगा तो हमको, तुमको भी मंत्री बनाएगा न!... तभी चाय वाला बोल उठा - बाबूजी बोलिए तो कल स्टेज के पासे में नमो चाय का केटली लगा दूं ... आपलोगों को चाय पिलाता रहूँगा ताकि उनको अपना दिन याद आता रहे और हमको भी अपना चरण में स्थान दे दें! ... तभी नंदकिशोर यादव वहां आ गए ... कहने लगे - हाँ आपलोग अपना गोटी सेट कर लीजिये हमको छोड़ियेगा तब समझ जाइये ... लालू जी का जगह अभी खालिए है! और बाबा अश्विनी चौबे जो केदार नाथ से सही सलामत बच के आए हैं उनके लिए भी पोर्टफोलियो सोंच के रखिये! तभी चाय वाला पैसे की मांग करने लगा तो अश्विनी जी बोले - अरे बुरबक तू ब्रहमन से पैसा मांग रहा है ...कल आ जैहो गाँधी मैदान में कूल हिशाब वही कर देंगे!....

के द्वारा: jlsingh jlsingh

सिंह साहब आदरणीय मोहन भगवत जी ने जो कहा है "वोट करने से पहले उम्मेदवार का चरित्र भांपने के साथ सम्बंधित पार्टी की नीतियों को भी परखें \ हमें मुद्दों पर मतदान करना चाहिए | उन्ही दलों को वोट देना चाहिए तो राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखे और उन्ही उम्मीदवारों को जितना चाहिए जो इमानदार हों ? ” क्या गलत है? गलत सही कहने के लिए राजनीती मे आना क्या जरूरी है? अगर आरo एसo एस० को बी जे पी के लोग अपने गार्जियन समघ्ते है तो आपको क्या तकलीफ होती है अगर कॉलेज मे कोई छात्र अपनी योग्यता के आधार पर डॉक्टर राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनता है तो कॉलेज का क्या दोष है आप तो कॉलेज पर भी पत्रकारिकता शुरू कर देंगे

के द्वारा:

प्रिय दुबे जी धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए ? दुबे आप जिस पार्टी के समर्थक और सदस्य है आपको बधाई मेरी भी सहानुभूति आपके साथ, आपके संस्थापक जिस विभाग में काम करते थे मैंने भी अपने बहुमूल्य चालीस वर्ष उसी विभाग की सेवा में बिताये है. इस लिए बहुत सी बाते परदे में रहे तो अच्छा ही है. जहाँ तक भूत पूर्व सी बी आई डाईरेक्टर की बात है आप को पता नहीं होगा की वह क्या वास्तु हैं और उनका सी बी आई डाइरेक्टर के पद पर कैसे पदार्पण हुआ था - इन्ही महोदय के कार्य काल में बोफोर्स की दलाली की जांच हुई थी ये स्वयं विदेश भी गए और सुबूत एकत्र कर के लाये थे उनका क्या हुआ ? और ऐसा भी नहीं है की उस समय किसी कांग्रेस की सरकार थी ?

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

सिंह जी शायद आप भूल रहें हैं सी. बी. आई को तोता की संज्ञा दी गयी है यानि उसको जैसा सिखाया जाता है वही वह करती है तोता को कहो राम- राम वह राम -राम कहने लगेगा फिर सिखाओ श्याम -श्याम कहो वह श्याम श्याम कहने लगेगा रही बात देश सेवक की (आपका इशारा नरेन्द्र मोदी की तरफ है ऐसा मैं समझ रहा हूँ) .हो सकता है आप कांग्रेस के लिए लिखते हों पर एक बात समझ लीजिये अब जनता उतनी बेवकूफ और नासमझ नहीं रही , खासकर बुद्धिजीवी वर्ग . जो समझ नहीं सकती की कब कौन क्या? कह रहा है, या क्या? कर रहा है अब जनता सबका मकसद जानती है आज देश की राजनीतिग्य एवं बड़े बड़े नेता चाहे वे किसी भी पार्टी के हों केवल येन केन प्रकारेण सत्ता में काबिज रह कर जनता का धन कैसे? लूटा जाये इसके जुगत में लगे रहते हैं जब बीजे पी को मौका मिलता है वह लूटती है और कांग्रेस तो पिछले ६५ वर्षों से लूट ही रही है बीच में कुछ समय को छोड़कर देश में कांग्रेस ही ज्यादा समय तक सरकार में काबिज रही है इससे आप भी इंकार नहीं करेंगे और सी बी आई क्या कर सकती है ? या क्या करती है इस विषय पर एक बहुत बड़ा आलेख सेवा निविर्त सी बी आई निदेशक श्री जोगेन्दर सिंह का दैनिक जागरण के सम्पादकीय में छपा था शायद आपने भी पढ़ा होगा अतः किसी को बदनाम करने के पहले सभी पहलुओं पर विचार करना जरूरी है मैं बीजे पी का सदस्य नहीं हूँ मैं तो आम आदमी पार्टी का समर्थक हूँ और सदस्य भी हूँ क्यूंकि उस पार्टी के विषय में अभी तक कुछ ऐसा वैसा सुनने को नहीं ,मिला है इस बात को आप भी मानेंगे

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

आखिर इस सेवक ने अपने प्रदेश मे लोकायुक्त को काम क्यूँ नहीं करने दिया। वंजारा ने कही पोल खोल के रख दी तो? कहीं माया कोडनानी और बुखारिया लोगों की स्वामिभक्ति डांवांडोल हो गयी तो? खनिज घोटाले की फ़ाइल खुल गयी तो? इतने बड़े बड़े घरानो को जो जमीने बाँट दी कौड़ी के दाम मे भले ही बाद मे अंडर टेबल कुछ ले लिया कहीं वो सब सामने आ गया तो? नकली लालकिला बनवाने मे,लाखों लोगों की भीड़ जुटाने मे करोड़ों रुपये की जरूरत कहाँ से पूरी होगी? कांग्रेसी सरकार से जबतक समझौता है ठीक है अगर पिछले अध्यादेश की तरह कुछ तालमेल मे कमी आ गई तो ? इनके गुलामों पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, वो तो जयजयकार लगते रहेंगे लेकिन ये जागी हुई जनता तो झाडू ले के दौड़ा लेगी ।

के द्वारा: ajaykumarsingh ajaykumarsingh

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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के द्वारा: Bhagwan Babu Bhagwan Babu

प्रिय योगी जी न तो मैं किसी को प्रधान मंत्री बना सकता हूँ न ही j l singh जी किसी को बना सकते है यह तो अभिव्यक्ति है जो अपनी समझ के तथ्यों पर आधारित है आपसे क्रोध की अपेक्षा लेख में किसी गलत तथ्य पर टिप्पड़ी की गुजारिश अवश्य करूँगा क्योकि जो फैक्ट्स हमारी आँखों के सामने हैं उनको कोई नहीं झुठला सकता ? वैसे भी कांग्रेस ने देश में राज्य करने का कोई ठेका तो ले नहीं रखा है और न ही बी जे पी कोई अछूत पार्टी है जो सत्ता में नहीं आ सकती यह तो देश की जनता और उसके विवेक का प्रशन है और पार्टियों के द्वारा अपनाये जाने वाले हथकण्डों पर निर्भर करता है की सफलता किसको मिलेगी ? आज जो कांग्रेस देश में शासन चला रही है उसे अकेले को जनता का बहुमत नहीं है केवल तकनिकी बहुमत है जो कई पार्टियों को मिला कर बना है/ आशा है आपका क्रोध कुछ शांत आवश्य हुआ होगा ?

के द्वारा:

श्री सिंह साब नमस्कार ! आपके लेख के सन्दर्भ में आदरणीय श्री जवाहर सिंह जी के भी शब्द देखे , व्यवस्थित लगते हैं ! आप मनमोहन सिंह जी को दोबारा प्रधानमंत्री बना दीजिये कोई परेशां नहीं होने वाला क्यूंकि वो इमानदार और सच्चे आदमी हैं लेकिन इस कांग्रेस का क्या करियेगा जिसने इस देश को लूट का मैदान बना दिया है ? उन का क्या करियेगा जिनके दामाद इस देश की भूख से मरती जनता को पीछे छोड़कर अपनी स्विस बैंक भर रहे हैं ? आज कोई ये नहीं कहता की मनमोहन सिंह से छुटकारा मिले बल्कि ये कहा जाता है की कांग्रेस से छुटकारा मिले ! देश की एकता , अखंडता , आर्थिक , सामाजिक , और विश्व बिरादरी में भारत की इज्ज़त के लिए अब ये बहुत जरुरी हो गया है की कांग्रेस को कुछ दिन बाहर का रास्ता दिखाया जाए ! अन्यथा ये कहेंगे की इन्हें फिर से जनता ने देश को लूटने के लिए परमिट दे दिया है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

आदरणीय एस पी सिंह साहब, सादर अभिवादन! आपने बहुत सी बातों को विस्तार पूर्वक रखा है - एक बात मैं जोड़ना चाहता हूँ. कट्टर भाजपा समर्थक और अंध मोदी भक्तों को आलोचना सुनने की आदत ही नहीं है. आप इंदिरा नेहरू परिवार को हजार गलियाँ देकर भी संतुष्ट नहीं होते, पर जरा सा किसी ने मोदी के विरोध में कुछ कहा नहीं कि सभी मोदी समर्थक हाथ धोकर पीछे पर जायेंगे - पहले आडवानी 'बुड्ढा', उसके बाद अमर्त्य सेन से भारतरत्न छीनने और उनकी बेटी को शर्मशार करने की कोशिश, अब शत्रुघ्न सिन्हा 'नचनिया' और उसकी बेटी पर भी हमला ... नितीश कुमार पकिस्तान समर्थक और अब बारी है शिवराज सिंह चौहान की ... इन सब कारनामों से मुझे नहीं लगता कि मोदी के वोट बैंक में वृद्धि होने वाली है! ....सादर !

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आज हमारे देश में एक बहुत बड़ी बहस छिड़ी हुई है धर्मनिरपेक्षता का क्या मतलब है,सभी ने अपने-अपने हित साध कर इसकी परिभाषा गडी,क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ किसी एक विशेष समुदाय का हित है,क्या इस देश में और किसी भी धर्मं-साम्प्रदाये का कोई महत्व नहीं|आज सभी अपने को धर्मनिरपेक्ष कहलाने में गर्व महसूस करते हैं| इन्सान पंथनिरपेक्ष तो हो सकता है लेकिन धर्मनिरपेक्ष नहीं जो अपने धर्मं का नहीं हो सका वो दूसरे धर्मं का केसे हो सकता है|गीता में श्री कृष्ण ने कहा धर्मं युद्ध में जो धर्मं के साथ नहीं समझो वो धर्मं के विरूद्ध खड़ा है, क्या अपने आप को अपने ही देश में हिन्दू कहना गलत है,जो लोग ये समझते है की अपने आप को हिन्दू रास्ट्रवादी कहना सही नहीं तो वो शायद नहीं जानते है की हिन्दुत्व क्या कहता है,वो धर्मं से अनजान है और अपने हित के लिए धर्मं की परिभाषा गड़ते हैं.हिन्दुत्व कहता है की 'सर्वे भवन्तु सुखिनः-सर्वे सन्तु निरामयः,सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुःख-भाग्वेत'और ये सिर्फ एक सच्चा हिन्दू ही कह सकता है| आज विश्व भर में भारत की पहचान उसकी सांस्कृतिक विरासत है अगर हम उसको ही त्याग देंगे तो क्या वजूद रह जाएगा हमारा, आज हमारे धर्मं ही हमारी पहचान हैं| जो अपने को हिन्दू कहने में शर्म महसूस करते हैं वो कभी भारत देश का भला नहीं कर सकते| मेरी नज़र में जिसने इस पावन धरा पर जन्म लिया है वो जन्मजात हिन्दू ही है अगर आप किसी दूसरे धर्मं से घृणा करते हैं तो आप हिन्दू नहीं हो सकते|किसी भी धर्मं के लोग गलत हो सकते हैं धर्मं नहीं,किसी भी धर्मं में कट्टरता के लिए कोई जगह नहीं है,हमे किसी भी धर्म को नुकसान नहीं पहुचाना चाहिए और न ही जबरदस्ती धर्म परिवर्तन,लेकिन अपने धर्म की रक्षा हेतु सदेव तत्पर रहना चाहिए| और अपने देश के नेताओं के लिए एक बात की जब जब हिन्दू घटा है देश बटा है,कृपया अपने धर्म पर अडिग रहे|धर्म रक्षा से ही देश रक्षा हो सकती है और देश रक्षा से ही धर्म रक्षा इसलिए गर्व से कहो हम हिन्दू हैं|

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जद यू की महिमा अब जनता दल यूनाइटेड के प्रबक्ता भी देश के खिलाफ बोलने से नही चुक रहे हैं.| इशरत जहा के मामले में ये लोग जनता को बरगला रहे हैं| आज इन लोगो ने भी कांग्रेस के आवाज में बोलना शुरु किया है |आज सारा विश्व जनता है इस बात की सच्चाई कि इशरत जहाँ कौन थी? देश के दुसमन आज बिहार कि लाडली बेटी हो गई है| आज सारा देश को पता है कि सीबीआई का यह रिपोर्ट में काफी परिवर्तन किया गया है | समाचारों के माध्यम से ये लोग चुनौती दे रहे है कि आने वाले इलेक्शन में बिहार कि जनता इसका जबाब देगी| पर जनता किसका जबाब देने के लिए बैठी है आने वाले समय में इसका जबाब मिलना तय है| इस पार्टी के लोग अब असंसदिये भाषा का प्रयोग पुरे ताकत के साथ कर रहे हैं और आम जन ये सब सुनने के तैयार नहीं है| ये सारी चीजे वोट तुस्तिकर्ण के लिए किया जा रहा है |

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ऐसी है मेरी कल्पना खुश रहती और खुशियां बांटती बड़ों का सम्मान है करती और करती बच्चों से प्यार सब से जाने रिश्ता निभाना है ऐसा उसका व्यवहार उसकी एक मुस्कान से मिले चैन ऐसी है मेरी कल्पना| मन में सच्ची आस्था है उसके हर कोई चाहे,बनना उसके जीवन का हिस्सा प्यारी सी ,निर्मल है उसकी काया दूसरों को प्रेरित है करती खूबियों से है भरी निर्बलों पर दया है करती मदद करती है सबकी सबको बस ,अपना है मानी क्या है इस दुनिया में भेद न जाने किसी को दुख देना जीवन है उसका अर्पित परिवार जनों का हरपाल रखती है ख्याल उत्साह और उमंग से भरी बातें है उसकी प्यारी -प्यारी मीठी से गुनगुनाहट लिए आँखों में हैं उसके सच्चाई की तस्वीर ऐसी शर्माती इठलाती सी झुकी हुई उसकी नज़रें है पावन उसका हृदय संकल्प बड़ा दृढ़ है उसमें हर मुसीबत के लिए है हरपाल तैयार हार न माने सदा मुस्काए ऐसी है मेरी कल्पना || कुमारी आभा सकची |

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ऐसी है मेरी कल्पना खुश रहती और खुशियां बांटती बड़ों का सम्मान है करती और करती बच्चों से प्यार सब से जाने रिश्ता निभाना है ऐसा उसका व्यवहार उसकी एक मुस्कान से मिले चैन ऐसी है मेरी कल्पना| मन में सच्ची आस्था है उसके हर कोई चाहे,बनना उसके जीवन का हिस्सा प्यारी सी ,निर्मल है उसकी काया दूसरों को प्रेरित है करती खूबियों से है भरी निर्बलों पर दया है करती मदद करती है सबकी सबको बस ,अपना है मानी क्या है इस दुनिया में भेद न जाने किसी को दुख देना जीवन है उसका अर्पित परिवार जनों का हरपाल रखती है ख्याल उत्साह और उमंग से भरी बातें है उसकी प्यारी -प्यारी मीठी से गुनगुनाहट लिए आँखों में हैं उसके सच्चाई की तस्वीर ऐसी शर्माती इठलाती सी झुकी हुई उसकी नज़रें है पावन उसका हृदय संकल्प बड़ा दृढ़ है उसमें हर मुसीबत के लिए है हरपाल तैयार हार न माने सदा मुस्काए ऐसी है मेरी कल्पना || कुमारी आभा सकची |

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आजादी का संदेश एक व्यापारी था,उसके पास एक बहुत समझदार तोता था| व्यापारी तोते से बहुत प्रेम करता था,एक बार व्यापारी को शहर जाना था पर शहर जाने के लिए उसे जंगल के मार्ग से होते हुए शहर जाना पड़ता था | घर के सभी लोगों ने तोहफ़ों के लिए फरमाइश की, शहर से लौटते समय वो लेकर आए,व्यापारी ने तोते से जाने से पहले पूछा की तुम्हें क्या चाहिए? तो इस पर तोते ने कहा -वो दुखी हो गया और बोला मुझे कुछ नहीं चाहिए ,पर मेरी हार्दिक इक्छा है की आप जब जंगल से होते हुए वापस घर में लौटे तो वंहा के स्वतंत्र और घूमने वालों तोतों को मेरा ये संदेश दे देना की “हमेशा खुश रहो और जीवन भर आकाश में उड़ते रहना ,मैं यंहा कैदी के समान पिंजड़े में बंद हूँ| मेरे बारे में भी तो विचार करो,और अंदर पड़े कैदी को बाहर निकालने का कोई उपाय बताओ ? व्यापारी ने उसका संदेश सुना और वादा किया की उसका संदेश जरूर पहुंचाएगा | व्यापारी काम खत्म करके घने जंगल से गुजरते हुए गया,वंहा उसे बहुत सारे तोतों की झुंड दिखाई दी, जो पेड़ पर बैठे हुए थे और अपना मन बहला रहें थे | व्यापारी वंहा रुका और अपने प्रिय तोते का संदेश देने लगा |उसकी बात पूरी होते ही एक तोता अपने पेड़ से गिर कर धरती पे आ गिरा | यह देख कर व्यापारी बहुत दुखी हो गया और सोचने लगा “यह क्या हुआ? इस प्यारे से तोते की जान मेरी वजह से गयी,अगर मैं इसे अपने तोते का संदेश नहीं देता तो यह अभी जिंदा रहता| शायद इस तोते को दुख सहा नहीं गया इसलिए इसने अपनी जान दे दी थोड़ी देर रुक कर फिर विचारने लगा -”अब पछताने से क्या फ़ायदा,कमान से निकला तीर कभी वापस नहीं होता “| विचारो में डूबा वो वापस लौट आया,अपने परिवारों के लिए बहुत सारे उपहार लाया था,सब को देकर वो अपने तोते के पास चला गया| जैसे ही वो उसके पास आया तो तोता बड़ी व्याकुलता से पूछने लगा -कहाँ है मेरा उपहार ?तोतों तक मेरा संदेश पहुचा दिया था ना? मेरे संबंधियों ने तुमसे क्या कहा? जो भी उनलोगों ने उत्तर दिया बिना कुछ छुपाय मुझे बता दो | सारे के सारे बातें, तोते ने एक ही सांस में कह डालें| व्यापारी ने ढंडी सांस ली और कहा-”ये मेरे प्यारे तोते! इस बात को भूल जाओ की तुमने मुझसे कोई संदेश बोला था ,मैं खुद ही पश्चयताप की अग्नि में जल रहा हूँ की मैंने क्यूँ तुम्हारा संदेश पहुंचाया ? व्यापारी ने दुखी कंठ से उत्तर दिया -जिद्द मत करो| यह बात सुनने की हिम्मत तुममें नहीं है |मैं तो खुद को ही कोस रहा हूँ ,की क्यूँ मैंने तुम्हारा कहना माना| तोते ने पूछा ऐसा क्या हुआ ,व्यग्रता से पंख फड़फड़ाये|तोता जिद्द करने लगा तब जाकर व्यापारी ने तोते को धीरज दिलाते हुए बोला की सुनो ,पर दुखी मत होना,सुनो – जब मैंने तुम्हारा संदेश कहा तो एक तोता तुरंत ही पेड़ से नीचे गिर पड़ा और तड़पता रहा |यह देख कर मैं लज्जित हुआ| जैसे ही व्यापारी ने अपने बात पूरी की तोता काँपने लगा और पिंजड़े में गिर पड़ा,उसके प्राण पखेरू उद गए |व्यापारी ज़ोर से चिलाया और विलाप करने लगा| अपने सिर पर हाथ पकड़ कर बैठ गया फिर उसने कुछ मिनट बाद पिंजड़े का दरवाजा खोला,और तोते को बाहर निकाला | जैसे ही तोते को जमीन पर रखा,तो तोता झट से दीवार के सामने बैठ गया | व्यापारी का मुख अचरज से भर गया,उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया,की वो क्या बोले, तोते ने व्यापारी को बोला मैं आपको बहुत शुक्रिया करना चाहता हूँ ,क्यूँ की आप मेरे लिए अनमोल तोहफा लाये हैं और वो उपहार है “स्वतंत्रता “जिसका कोई मोल नहीं है | कोई भी बंधन में नहीं रहना चाहता है| जंगल के तोते ने गिर कर बता था की मैं खुद कैसे स्वतंत्र हो सकता हूँ | व्यापारी निःशब्द खड़ा रह गया और तोता आकाश में फुर उड़ गया | कुमारी आभा,सकची जमशेदपुर |

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श्री सिंह जी मैं आपकी बात से भी सहमत हूँ ,हमारे यंहा इन्सानों की कीमत भलें ही कुछ न हो, पर अपनी जान की कीमत को तो हम ही समझ सकते हैं|निरंतर ही प्रयास करने से सब कुछ सही होगा|जब तक हम अपनी परेशानियों को लोगों तक पहुंचाएँगे ही नहीं तो कोई सोचने पे मजबूर कैसे होगा ,क्यूँ न हमारा समाज साथ तभी देता है जब हम खुद से आवाज उठाते हैं ,नहीं तो कोई नहीं सुनता "कुएँ का मेढ़क बन के क्या होगा| ऐसा नहीं है कोई भी सही -गलत काम सिर्फ एक या दो आदमी के लिए होता है उसका फर्क तो हर किसी को फर्क पड़ता है| आज को हम चुप हैं और अपनी समझदारी समझते हैं न किसी मामले में ना पड़े या उसका विरोद नहीं करते ,तो समाज उसकी को ही अपने रूप में ढाल लेता है और कल वो वही समस्या से हमे भी जूझना पड़ता है,तो हम सब क़ी भलाई इसी में है सभी सही -गलत चीज़ों को परखें और उनपर कड़ी नज़र रखें और अपना आवाज़ रखें | शुरुआत तो हम को ही करना होगा,क्यूँ क़ी कोई हमारे लिए कुछ नहीं करेगा, हमें ही आगे बढ़ना होगा और राशतें खोजने होंगे |

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आजादी का संदेश एक व्यापारी था,उसके पास एक बहुत समझदार तोता था| व्यापारी तोते से बहुत प्रेम करता था,एक बार व्यापारी को शहर जाना था पर शहर जाने के लिए उसे जंगल के मार्ग से होते हुए शहर जाना पड़ता था | घर के सभी लोगों ने तोहफ़ों के लिए फरमाइश की, शहर से लौटते समय वो लेकर आए,व्यापारी ने तोते से जाने से पहले पूछा की तुम्हें क्या चाहिए? तो इस पर तोते ने कहा -वो दुखी हो गया और बोला मुझे कुछ नहीं चाहिए ,पर मेरी हार्दिक इक्छा है की आप जब जंगल से होते हुए वापस घर में लौटे तो वंहा के स्वतंत्र और घूमने वालों तोतों को मेरा ये संदेश दे देना की "हमेशा खुश रहो और जीवन भर आकाश में उड़ते रहना ,मैं यंहा कैदी के समान पिंजड़े में बंद हूँ| मेरे बारे में भी तो विचार करो,और अंदर पड़े कैदी को बाहर निकालने का कोई उपाय बताओ ? व्यापारी ने उसका संदेश सुना और वादा किया की उसका संदेश जरूर पहुंचाएगा | व्यापारी काम खत्म करके घने जंगल से गुजरते हुए गया,वंहा उसे बहुत सारे तोतों की झुंड दिखाई दी, जो पेड़ पर बैठे हुए थे और अपना मन बहला रहें थे | व्यापारी वंहा रुका और अपने प्रिय तोते का संदेश देने लगा |उसकी बात पूरी होते ही एक तोता अपने पेड़ से गिर कर धरती पे आ गिरा | यह देख कर व्यापारी बहुत दुखी हो गया और सोचने लगा "यह क्या हुआ? इस प्यारे से तोते की जान मेरी वजह से गयी,अगर मैं इसे अपने तोते का संदेश नहीं देता तो यह अभी जिंदा रहता| शायद इस तोते को दुख सहा नहीं गया इसलिए इसने अपनी जान दे दी थोड़ी देर रुक कर फिर विचारने लगा -"अब पछताने से क्या फ़ायदा,कमान से निकला तीर कभी वापस नहीं होता "| विचारो में डूबा वो वापस लौट आया,अपने परिवारों के लिए बहुत सारे उपहार लाया था,सब को देकर वो अपने तोते के पास चला गया| जैसे ही वो उसके पास आया तो तोता बड़ी व्याकुलता से पूछने लगा -कहाँ है मेरा उपहार ?तोतों तक मेरा संदेश पहुचा दिया था ना? मेरे संबंधियों ने तुमसे क्या कहा? जो भी उनलोगों ने उत्तर दिया बिना कुछ छुपाय मुझे बता दो | सारे के सारे बातें, तोते ने एक ही सांस में कह डालें| व्यापारी ने ढंडी सांस ली और कहा-"ये मेरे प्यारे तोते! इस बात को भूल जाओ की तुमने मुझसे कोई संदेश बोला था ,मैं खुद ही पश्चयताप की अग्नि में जल रहा हूँ की मैंने क्यूँ तुम्हारा संदेश पहुंचाया ? व्यापारी ने दुखी कंठ से उत्तर दिया -जिद्द मत करो| यह बात सुनने की हिम्मत तुममें नहीं है |मैं तो खुद को ही कोस रहा हूँ ,की क्यूँ मैंने तुम्हारा कहना माना| तोते ने पूछा ऐसा क्या हुआ ,व्यग्रता से पंख फड़फड़ाये|तोता जिद्द करने लगा तब जाकर व्यापारी ने तोते को धीरज दिलाते हुए बोला की सुनो ,पर दुखी मत होना,सुनो - जब मैंने तुम्हारा संदेश कहा तो एक तोता तुरंत ही पेड़ से नीचे गिर पड़ा और तड़पता रहा |यह देख कर मैं लज्जित हुआ| जैसे ही व्यापारी ने अपने बात पूरी की तोता काँपने लगा और पिंजड़े में गिर पड़ा,उसके प्राण पखेरू उद गए |व्यापारी ज़ोर से चिलाया और विलाप करने लगा| अपने सिर पर हाथ पकड़ कर बैठ गया फिर उसने कुछ मिनट बाद पिंजड़े का दरवाजा खोला,और तोते को बाहर निकाला | जैसे ही तोते को जमीन पर रखा,तो तोता झट से दीवार के सामने बैठ गया | व्यापारी का मुख अचरज से भर गया,उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया,की वो क्या बोले, तोते ने व्यापारी को बोला मैं आपको बहुत शुक्रिया करना चाहता हूँ ,क्यूँ की आप मेरे लिए अनमोल तोहफा लाये हैं और वो उपहार है "स्वतंत्रता "जिसका कोई मोल नहीं है | कोई भी बंधन में नहीं रहना चाहता है| जंगल के तोते ने गिर कर बता था की मैं खुद कैसे स्वतंत्र हो सकता हूँ | व्यापारी निःशब्द खड़ा रह गया और तोता आकाश में फुर उड़ गया | कुमारी आभा,सकची जमशेदपुर |

के द्वारा:

लेकिन सबसे बड़ी त्रासदी तो रिपोर्टिंग कर रहे मीडिया के लोग ही है जिनमे यह होड़ लगी है की वह विनाश लीला की प्रथम रिपोर्टिंग किस प्रकार करे और अपने चैनल की रेटिंग किस प्रकार बढ़ाएं – लेकिन उनको यह शर्म नहीं आती की वह लोगो की सहायता किस प्रकार से कर रहे है, अगर वह सबसे पहले पहुचने का दावा करते है तो वह यह भी बताएं की उन्होंने कितने लोगों की सहाय और किस प्रकार से की क्या इस त्रासदी में भी उनका केवल एक ही धर्म है की वह केवल सरकारी कमियों को ही उजागर करे और अपनी झोली भरे जो उनका धर्म है ? हालाँकि श्री सिंह साब , मैं मीडिया में नहीं हूँ लेकिन मुझे लगता है वो दुर्गम स्थानों पर पहुंचकर अपना धर्म निभा रहे हैं और पल पल की जानकारी हमारे लिए इकठ्ठा कर रहे हैं जिससे हमें हमारे अपनों के बारे में जानकारी मिल सके ! ये उनका धर्म है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

प्यार प्यार कमजोर दिल इंसानों के लिए नहीं है प्यार एक आस्था है , एक शक्ति है प्यार कोमल और अमर है , प्यार निर्मल है अजर है प्यार सहनशीलता को बढ़ता है, प्यार मन की मजबूती को दर्शाता है प्यार रिश्तों को सच्चाई से निभाना सिखाता है प्यार जीवन को बेहतर बनाता है प्यार खुशियों में चार-चाँद लगाता है प्यार दूरगामी को निकट लाता है प्यार नव-चेतन जागता है प्यार हर बंधनों से मुक्त है प्यार कोमलता की ओर ले जाता है प्यार निर्णयों को लेने की क्षमता को मजबूत करता है प्यार दुश्मनी को दूर करता है प्यार जलन को खत्म करता है प्यार किसी जाति-धर्म का मोहताज नहीं प्यार तो बस जीवन जीने का नाम है साथियों प्यार सच्ची सुंदरता का प्रतीक है प्यार समस्या को आसान बनाता है प्यार दूसरों की सेवा का नाम है प्यार निर्बल को सबल बनाता है प्यार तप्ति धूप में अचानक से झम -झम बारिश का नाम है प्यार सिर्फ लेने का नहीं, देने का भी नाम है प्यार बाटें खत्म नहीं होता, जैसे समुद्र से पानी कम नहीं होता है प्यार तो खुशी में आंखे नम भी करता है तो कंही प्यार रोते हुये को हसाना भी जानता है प्यार तो अनमोल सदा, जो हर कोई चाहे है पाना प्यार की कीमत क्या लगाओगे,सारी दुनिया है इसकी दीवानी प्यार का बदला प्यार सिखाये, प्यार से जीवन हो सदा सुखमयी प्यार से दुनिया जीता जाता , प्यार है ज्योति है अनंतमयी ।

के द्वारा:

गा़डी़ पार्किंग कहां करें ? आजकल हर चीज़ के दाम लगते हैं,अब एक-दो रुपये से काम नहीं चलेगा,देने होंगे पूरे पांच रुपये। है ना कमाल की बात।आज मुझे पार्किंग के देने पड़े पुरे 25 रु. कमानी सेंटर बिषटुपुर के पास पार्किंग करने के 5 रु.,स्टेट बैंक आफ इंिडया के पास पार्किंग करने के 5 रु.,कोलकाता बाज़ार के पास पार्किंग करने के 5 रु.,बसंत टाकिज झंडा चौक के पास पार्किंग करने के 5 रु.,और फिर लेदर वर्ल्ड के पास पार्किंग करने के 5 रु.। अधिकतर टिकट काटने वाले बुजुर्ग आदमी ही थे। और अक्सर इन लोगों से बहसा-बहसी हो जाती है। मनमाना ढंग से टिकट काट रहे हैं।मैंने पूछा ,ःअंकल पहले तो यहां पार्किंग के पैसे तो नहीं लगते थे,तो उनहोनें कहा ः ये तो 20 सालों से नियम है यहां का। फिर मैंने कहा ःइन 20 सालों मे मैंने तो आजतक पैसे नहीं दिये । बड़े गुस्से में कहने लगे आपको क्या पता हम हमेशा से लेते रहें हैं। अब आप ही बताइए ,अब लोगों का क्या होगा? अप-शबद भी बोलने से बाज नहीं आते,क्या यही है हमारी व्यवस्था ….. पुलिस भी इस विषय मे चुप्पी साधे हुऐ है। आप ही बताईए ये कितना सही है ? कब तक चलता रहेगा ये सबकुछ…..? कुमारी आभा, बारादवारी,साकची जमशेदपुर।

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गा़डी़ पॊिकंग कहां करें आजकल हर चीज़ के दाम लगते हैं,अब एक-दो रुपये से काम नहीं चलेगा,देने होंगे पूरे पांच रुपये। है ना कमाल की बात।आज मुझे पॊिकंग के देने पड़े पुरे 25 रु.कमानी सेंटर बिषटुपुर  के पास पॊिकंग करने के 5 रु.,सटेट बैंक आफ इंिडया  के पास पॊिकंग करने के 5 रु.,कोलकाता बाज़ार के पास पॊिकंग करने के 5 रु.,बसंत टाकिज झंडा चौक के पास पॊिकंग करने के 5 रु.,और फिर लेदर वॆलड के पास पॊिकंग करने के 5 रु.। अधिकतर टिकट काटने वाले बुजुॆग आदमी ही थे। और अकसर इन लोगों से बहसा-बहसी हो जाती है। मनमाना ढंग से टिकट काट रहे हैं।मैंने पूछा ,ःअंकल पहले तो यहां पॊिकंग के पैसे तो नहीं लगते थे,तो उनहोनें कहा ः ये तो 20 सालों से नियम है यहां का। फिर मैंने कहा ःइन 20 सालों मे मैंने तो आजतक पैसे नहीं दिये । बड़ी गुससे में कहने लगा आपको कया पता हम हमेशा से लेते रहेंगें। अब आप ही बताइए ,अब लोगों का कया होगा। अप-शबद भी बोलने से बाज नहीं आते,कया यही है हमारी वयवसथा..... पुलिस भी इस विषय मे चुपपी साधे हुऐ है। आप ही बताईए ये कितना सही है। कब तक चलता रहेगा ये सबकुछ.....। कुमारी आभा, बारादवीरी,साकची जमशेदपुर।

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के द्वारा: shalinikaushik shalinikaushik

के द्वारा: jlsingh jlsingh

पारिस्थितिक दृष्टिकोण पर आधारित पठनीय आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "भारत वासियों अब इस आधुनिक युग में तुम मेरा पीछा छोड़ दो और अगर तुम्हे अपने देश से प्रेम है तो देश में होने वाले भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्तियों को जलाओ, निरीह बच्चियों से बलात्कार करने वालों को जलाओ, खाद्ध्य पदार्थों में मिलावट करने वालों को जलाओ, देश को लूटने वालों को जलाओ, तो तुम्हारा कुछ भला हो सकता है केवल मेरा प्रतीक पुतला हर वर्ष जलाकर तुम्हे कुछ नहीं मिलने वाला /इस लिए मैं लंका पति त्रिकाल दर्शी दशानन रावण तुम्हारे देश वासियों से प्रार्थना करता हूँ कि आज से सपथ लो कि मेरा पुतला जला कर अपने धन और शक्ति को क्यों बेकार नष्ट करते हो मेरा पुतला जलाने के स्थान पर अपने देश के अन्दर छुपे हुए रावणों को जलाओगे तो तुम्हारा कल्याण होगा ?"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

और जहाँ तक अरविन्द केजरीवाल का विषय है उनका पूरा आन्दोलन एवं उनका पूरा जीवन परिचय देखिये जब से वे काम करने लायक हुए हैं उन्होंने विदेशी कंपनियों और अमेरिका के लिए ही काम किया है.........वे अमेरिकेन अगेंट है सीधी सी बात है........शायद इन प्रश्नों पर केजरीवाल के कोई जवाब नहीं होंगे  FDI WALLMART और ५१% विदेशी पूंजी निवेश का आपने क्यूँ विरोध नहीं किया आपने स्वदेशी के विषय में अब तक कोई अभियान नहीं चलाया न ही आप स्वदेशी भारत के विषय में कोई कल्पना रखते हैं अब तक आपने समाज सेवा भी विदेशी वर्ल्ड बैंक से आये पैसे से की है क्या वो आपको समाज सेवा थी क्या वर्ल्ड बैंक इतना अधिक दयालु और उदार हो गया है की समाज सेवा के लिए पैसे खर्चा करने लगा है क्या आप भी मनमोहन सिंह के तरह ही विदेशी पूंजी निवेश में देश का विकास मानते हैं ?

के द्वारा: pritish1 pritish1

भारत की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों का विश्लेषण किया जाय तो यह सहज निष्कर्ष प्राप्त होता है कि हमारी व्यवस्था को पूर्ण राजनीतिक शुद्धीकरण और नए राजनीतिक विकल्प , राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है | जब परिस्थितिया परिपक्व हो जाती है तो मॉस मोबलाइजेशन को कोई भी सत्ता नही रोक सकती अन्ना और अरविन्द का आंदोलन उस परिपक्वता की ही अभिव्यक्ति है | यह नेत्रित्व की कुशलता और दूरदर्शिता पर निर्भर है कि वह जन संकुलता को किस हद तक आगे बढ़ा पाते है | आज अगर अरविन्द असफल होते है तो नया नेत्रित्व उभर कर आयेगा क्योकि हर महान नेत्रित्व अपने समय का शिशु होता है | पर आज की स्थितियों में किसी तानाशाह के उभरने की भी प्रबल संभावना भी है | जनता के मनोविज्ञान में बदलाव एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है पर हमारी देशीय परिस्थितिया इस बात की इजाजत नही देती है कि इतना लंबा इन्तजार किया जाय अतः निस्यन्दन सिद्धांत को अपनाना होगा जिसमे सुद्धीकरण ऊपर से छन कर नीचे तक आयेगा | यह एक अल्पकालिक प्रक्रिया होगी | आई.ए सी. टीम कितनी व्यक्तिगत शुद्धता रखती है यह बहस आज की दशायो में प्रक्रिया को पीछे धकेलने वाली होगी | ऐसे व्यक्ति को खोजना - जिसने पाप न किया हो जो पापी न हो - मौजूदा भ्रष्ट व्यवस्था को मौक़ा देने का और यथास्थितिवाद को बनाए रखने की चाल है जिसे समझना होगा | जिस सरकार का मंत्री एक व्यक्तिगत पत्र को सार्वजनिक मंच पर पढ़ सकता हो और खुलेआम क़त्ल की धमकी दे कर यह कह सकता हो कि - तुम केवल जवाब सुनो सवाल करना छोड़ दो वह इतनी सहजता इस टीम के प्रति क्यों दिखा रही है यह भी सोचने की बात है |

के द्वारा: utkarshsingh utkarshsingh

आदरणीय सिंह साहब, सादर ! आपका विश्लेषण पढ़ कर मन कुंठित हो गया ! और अब लगने लगा कि केजरीवाल जैसे लोग क्यों नहीं सफल हो सकते ! एक तरफ तो आप कह रहे हैं........ ""अरविंद शायद यह भूल गए हैं कि भारत की जनता चंद रुपयों और जरा से लालच के लिए अपना वोट बेच देती है। इसके बावजूद अगर अरविंद जनता के विचारों को प्रमुखता देकर सत्ताधारी पार्टी के अलावा अन्य विपक्षी दलों से भी लोहा ले रहे हैं तो यह उनकी सबसे बड़ी नासमझी है।"" और एक तरफ आप कह रहे हैं ........ ""जनता की परिपक्वता पर संदेह करने वाले स्वयं ही अल्पज्ञ ही हैं "" क्या आप यथास्थिति बनाए रखने कि हिमायत कर रहे हैं, या स्वयं के साथ दुसरे को भी यह समझाना चाहते हैं कि बदलाव हो ही नहीं सकता ! परिवर्तन की बात सोचनेवाले महामूर्ख हैं ! एक आदर्श समाज की कल्पना करना और उसके लिए संघर्ष करना बेवकूफी है ? भ्रष्टाचार को शक्तिहीन करने के लिए प्रयासरत होना महामूर्खता है ? भ्रष्टाचार के कारनामों को उजागर करना अशांति फैलाना और समय बर्बाद करना है ? सिंह साहब, मैं ये तो नहीं जानता कि केजरीवाल टीम कितना सफल हो पायेगी, पर उनके जोश और जज्बे को हार्दिक नमन अवश्य करता हूँ ! आप उन्हें छल के रास्ते पर चलने कि सलाह दे रहे हैं ! परन्तु छल तब किया जाता है जब उद्देश्य को येन-केन-प्रकारेण हासिल करना हो, जो कि अन्य राजनितिक पार्टियां कर रही हैं ! उनका एक ही उद्देश्य है सत्ता हासिल करना ! चाहे इसके लिए जो भी करना पड़े ! जितना भी नीचे गिरना पड़े ! और आप उन्हें चतुर मान रहे हैं ! परन्तु मेरी तो हार्दिक कामना है, भले केजरीवाल जी को एक भी सीट न मिले, पर वे जैसे जुझारू आज हैं, वैसे ही कल भी बने रहें ! कम से कम एक दीपक तो जलता रहे !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

आदरणीय एस पी सिंह साब और संतोष कुमार जी, आप दोनों की इन तर्क युक्त बातों से अतिरिक्त जानकारी से मैं अभिभूत हुआ, मैं आप दोनों का आदर करते हुए यह निवेदन करूंगा की बर्तन को जितना मांजा जाता है उसमे और चमक आती है अतः अपने विचार देते रहें तो मेरे जैसे अल्पग का तो भला हो जाएगा! और एस. पी साब, आपसे जानना चाहूंगा क्या राज कुमार धुर्पद वही है जो आगे चलकर राजा धुर्पद बने, जिनकी बेटी द्रोपदी या पांचाली,पांडवों की पत्नी बन सकीं? अब एक सवाल संतोष कुमार जी से, आप ने मेरी जानकारी बढाने में जो सहायता की उसके लिए आभारी हूँगा! मै किसी प्रकार से भी आपकी जानकारी पर कोई सवाल न उठाते हुए पूछना चाहता हूँ की क्या केवल 'गाय' जैसी वस्तु के लिए धुर्पद नरेश क्यों मना करेंगे अपने गुरु जी, को? यह समझ में नहीं आता? मुझ पर बिना किसी 'संदेह और शक' के समाधान कर सके तो अत्यंत आभारी हूँगा ! साथ में यह भी बताईये की क्या ये वही धुर्पद है जो पांचाली ( द्रौपदी ) के पिता थे?

के द्वारा:

आदरणीय पाठक जी, मैंने केवल गुरु शिष्य परम्परा पर प्रकाश डालने की चेष्टा की है जो पुरातन काल से चली आ रही है और कभी समाप्त भी नहीं होगी क्योंकि मनुष्य को इस संसार में कुछ सीखने लिए कहीं न कहीं किसी गुरु की शिक्षा की आवश्यकता होती है , लेकिन जब व्यक्ति स्वयं स्वयंभू गुरु बन कर, अपने डेरे, आश्रम, संस्था, समागम के नाम पर देशवासियों को मूर्ख बना कर धन दौलत एकत्र ही नहीं करता पूरा साम्राज्य बना कर, सुचिता और आदर्श की दुहाई देता है यहाँ तक की सत्ता को भी चुनौती देता है लेकिन अपने आचरण को दागदार ही रहने देता है तो गुरु के द्वारा ऐसा स्वांग क्यों. ? रही बात मेरे द्वारा द्रोणाचार्य प्रकरण को लिखने की तो मैंने केवल संक्षेप में ही लिखा है उसके संक्षेपीकरण में कोई त्रुटी हो सकती है आप विद्वान व्यक्ति है आपने विस्तृत व्याख्या की इस लिए मैं आपकी टिप्पणी डिलीट नहीं करूँगा> जैसा मैंने ऊपर कहा है - संसार में व्यक्ति बिना गुरु के निर्जीव ही है हर कदम पर किसी न किसी गुरु की जरूरत होती है इस लिए ही आधुनिक गुरु भी हाईटेक हो गए है / स्वयंभू गुरुओं की चाँदी हो रही है ? लेकिन यहाँ मैं सिक्ख धर्म की प्रशंसा करना चाहूँगा की वहां दसवें गुरु जी ने जिन्दा गुरु की परम्परा को ही समाप्त कर दिया और उसके बाद गुरु ग्रन्थ साहेब जी को ही सच्चे गुरु की पदवी पर नवाजा गया है और वही उच्च परम्परा आज भी पूर्ण सम्मान और शक्ति के साथ पुरे संसार में विराजमान है और उच्च आदर्शों के साथ पुरे संसार में निभाया जाता है ? आपका धन्यवाद आपकी सूचना के लिए इंदिरा गाँधी के गुरु नहीं केवल योग गुरु नाम था "धीरेन्द्र ब्रहमचारी"

के द्वारा:

श्रद्धेय पाठक जी ,..सादर प्रणाम आपकी प्रतिक्रिया से सुन्दर नयी जानकारियाँ मिली हैं ,..आदरणीय सिंह साहब की भावना और उदाहरण दोनों से सहमत होने या न होने का कोई अर्थ नहीं है ,...जितना मूरख को ज्ञात है उस हिसाब से द्रोणाचार्य ने अपने आश्रम के लिए ध्रुपद नरेश से गाय मांगी थी जिसे उन्होंने इनकार कर दिया था ,..मित्रता का हवाला देने पर उन्होंने ताना मारा कि मित्रता बराबरी वालों में होती है ,..इस अपमान से आहत होकर द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिना में पांडवों के हाथों ध्रुपद नरेश को बंदी बनवाया था ,..ध्रुपद नरेश ने अपनी मुक्ति के बदले आधा राज्य उन्हें समर्पित कर दिया ,..तब द्रोणाचार्य ने कहा कि नरेश अब हम मित्र हो सकते हैं ,..ध्रुपद नरेश के पश्चाताप के उपरान्त द्रोणाचार्य ने वह भी उनको वापस कर दिया और ,..यदि द्रोणाचार्य चाहते तो स्वयं ध्रुपद नरेश को परास्त कर सकते थे लेकिन गुरु मर्यादा से उन्होंने ऐसा नहीं किया ,...हालांकि उनके बीच कटुता सदा रही लेकिन ध्रुपद नरेश द्रोणाचार्य के सामने सदा नत ही रहते थे .. गुरु शंकर देव की तलाश के लिए बाबा रामदेव ने हरसंभव उपाय किये थे ,..निरंकुश सत्ता से बैर का परिणाम वो जानते हैं ,..या तो सत्ता मिटेगी या फिर वो !..सरकार हरसंभव उनको दबाने का प्रयास कर रही है ,..लेकिन लावा कहाँ ज्यादा दिन दबा है ,..फूटेगा और ये राक्षस स्वाहा होंगे ,.....ज्ञानवर्धन के लिए कोटिशः आभार आपका ..सादर

के द्वारा:

आदरणीय एस. पी.सिंह साहब,                              सादर नमस्कार, आपके उदाहरणों से तो मै भी सहमत नहीं हूँ निचे भी एक मित्र ने काफी अच्छी पौराणिक जानकारी दी है. खैर, जब जांच में कुछ ना निकले या पुलिस अपने काम में नाकाम रहे तो फिर वह घटनास्थल के ही किसी सदस्य को जिम्मेदार बता देती है और यही गुरु शंकर देव जी के साथ कि घटना पर भी हुआ है. पुलिस ने इस काम पर आयपीएस से लेकर पूरे दल बल को इस कार्य में लगाया था इसमें ऐसे पुलिस अधिकारी को भी जिम्मेदारी दी गयी जों कि कई श्रेष्ठ कार्य कर चुका था. फिर जों जानकारी प्राप्त है उसके अनुसार गुरु शंकरदेव उन दिनों किसी गंभीर बिमारी से ग्रस्त थे हाँ यह भी बात जानकारी में आयी है कि वह आश्रम में अपनी अनदेखी से नाराज भी थे. और एक बात जों खास कहना जरूरी समझता हूँ कि गुरु शंकरदेव जी से बाबा को कोई खतरा नहीं था ना ही उनके ना रहने से कोई लाभ ही उन्हें होने वाला था.                    जों मै समझ रहा हूँ वह बात यह है कि कांग्रेस को जब कुछ नहीं मिल रहा है तो वह इस प्रकार कि घटनाओं पर जनता का बरगलाने कि कोशिश कर रही है. सरकार के पास सी बी आई से लेकर सारी जांच एजेंसियां है वह जांच शुरू करे और दूध का दूध  कर के दिखाए. 

के द्वारा: akraktale akraktale

श्री सिंह साहब आप के लेख के पीछे छिपी भावना तो अच्छी है। किन्तु जो उदाहरण आप ने दिया है उसके पीछे छिपी भावना को संभवतः आप सही प्रकार से नहीं समझ पाए है। क्षमा कीजिएगा मै आप की बुद्धि को चुनौती नहीं दे रहा हूँ लेकिन शायद आप भी "अश्वत्थामा मरो नरो वा कुंजरो" के शिकार हो गए है। एकलव्य अधिरथ की बहन निवाला का पुत्र था। यह वही अधिरथ था जिसने कर्ण को पाल पोश कर बड़ा किया था। कर्ण सदा पांडवो से दुशमनी रखता था। और वह जानता था की उसकी माता कुंती अर्जुन के वध में सदा अवरोध खडा करेगी। तथा कर्ण उसे मारने में बहुत कठिनाई झेलेगा। इसीलिए उसने अपने उस तथा कथित भांजे एकलव्य जिसका जन्म का नाम भान्ड्रक था उसे द्रोणाचार्य के पास धनुर्विद्या की उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा। कर्ण यह जानता था की गुरु द्रोण उसे कभी भी शिक्षा देना स्वीकार नहीं करेगें। जिससे भान्ड्रक के मन में और ज्यादा ईर्ष्या एवं विद्रोह की भावना जन्म लेगी। संभवतः आप को यह भी पता होगा की जब गुरु द्रोण ने भान्ड्रक से कहा की अब उसकी शिक्षा पूरी हो चुकी है, वह अब गुरु दक्षिणा देवे,तो उसने दक्षिणा माँगने को कहा। द्रोणाचार्य ने कहा की वह सदा किसी भी धनुर्युद्ध से विरत रहे। भान्ड्रक ने हामी भर ली। किन्तु गुरु द्रोण से उसने इस दक्षिणा के पीछे के रहस्य को पूछा। तो उन्होंने सच्चाई बता दिया। भान्ड्रक ने विनय किया की हे गुरुदेव यदि मैं धनुर्विद्या से विरत हो जाउंगा तो मै कोल, किरात, भील, बनवासी आदि अन्य लोगो को कम से कम उनकी अपनी रक्षा सुरक्षा का भी प्रशिक्षण नहीं दे पाउँगा। क्योकि आप तो ठहरे राज घराने के गुरु। फिर उनका क्या होगा? इसलिए मुझे धनुर्विद्या से विमुख न करें। मै धनुष संचालन में प्रमुख भूमिका अदा करने वाली प्रमुख ऊंगली "अंगुष्ठ" ही आप को दे दे रहा हूँ। "नैव प्रवक्ष्यामि भू देवो शर संधानम रणे सदा। दास्याम्यहम स्वैकलव्यम दक्षिणो दाक्षिने भवान।" और तभी से भान्ड्रक का नाम एकलव्य पड़ गया। अन्यथा माँ के आदेश तथा मामा कर्ण के आदेश के अनुसार एकलव्य को अर्जुन के साथ युद्ध करना ही पड़ता। वैसे तो विधाता ने जो रच रखा है। वही होगा। किन्तु इस उदाहरण के पीछे जो कारण बताया गया है, वह इसी प्रकार है। दूसरी बात यह की द्रोणाचार्य ने राजा द्रुपद से आधा राज्य माँगा था क्या अर्जुन ने उसे विजित कर द्रोणाचार्य को दिया? द्रोणाचार्य किसी राज्य के राजा भी थे मैंने ऐसा कही नहीं पढ़ा है। क्योकि पांचाल, मारवाड़, इन्द्रप्रस्थ एवं गान्धर्व (हिमाचल) के मध्य किसी अन्य प्रांत का जिक्र मैंने नहीं पढ़ा है। द्रोणाचार्य का बेटा अश्वत्थामा, बेटी पिंगलाक्षी एवं उनकी धर्मपत्नी सब देवगिरी (हस्तिनापुर से सटे यमुना तट पर एक आश्रम) में ही रहते थे। फिर उनके राज्य में किसी राज्य के विलय का आख्यान मैंने तो नहीं पढ़ा। चूंकि मैंने नहीं पढ़ा इसलिए हो सकता है, यहाँ आप का कथन सत्य हो। मै आप के इस कथन को चुनौती नहीं दे सकता। किन्तु मुझे इतना ही ज्ञात है की द्रौपदी एवं पिंगलाक्षी दोनों ही अग्नीप्रसूता थीं। दोनों में अंतरंगता थी। द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न आदि को उनके दुराचरण के कारण शिक्षा देने से इनकार दिया था। इसीलिए पांचाल नरेश से सदा उनकी दुश्मनी रहा करती थी। पिंगलाक्षी और द्रौपदी की अंतरंगता उसे सहन नहीं थी। परिणाम स्वरुप पिंगलाक्षी के मांडव्य ऋषि के पोते नीलद्युति के विवाह के समय पांचाल राज्य का उत्तरवर्ती क्षेत्र अर्जुन ने विजित कर दोनों को राजा की तरफ से उपहार में सौंप दिया। आप स्वयं सोचिये, अद्वितीय एवं अति धुरंधर पराक्रम वाले द्रोणाचार्य के लिए अर्जुन से पांचाल विजय की क्यों अपेक्षा की गयी? जिनकी व्यूहरचना एवं शरवर्षा से समस्त पांडव सेना बौखला गयी, उन्हें पांचाल विजय के लिए अर्जुन की सहायता की क्या आवश्यकता थी? द्रोणाचार्य ने तो सिर्फ आधा ही राज्य माँगा था। विश्वामित्र ने तो राजा हरिश्चंद्र से उनका सारा राज-पाट ही ले लिया था। लेकिन आप यह अच्छी तरह जानते है की विश्वामित्र ने किस लालच से वह राजपाट लिया था। मै समझता हूँ, घटना के पीछे निहित उद्देश्य को यदि उल्लिखित किया जाय तो अच्छा है। वैसे आप का अपना जो भी विचार हो। रही बात आधुनिक गुरु एवं शिष्यों की, तो यथा राजा, तथा प्रजा। मुझे याद नहीं आ रहा है। एक गुरूजी भारत की प्रथम महिला प्रधान मंत्री स्वर्गीया श्रीमती इंदिरा गांधी के भी हुआ करते थे। पता नहीं कौन स्वामी नाम था। शम्बरासुर के गुरु शुक्राचार्य ही होगें वृहस्पति नहीं। आप के लेख की भावना अच्छी है। मुझे सिर्फ उदाहरण से आपत्ति है। फिर भी यह मेरी नीजी आपत्ति है। हो सकता है बाकी सब लोग इससे सहमत हो। सिंह साहब, यदि मेरी इस टिप्पड़ी से आप को ठेस हो तो इस टिप्पड़ी को आप डिलीट कर दीजिएगा . धन्यवाद।

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

आदरणीय सिंह साहब, सादर ! आपने समस्या तो दिखाई, पर समाधान नहीं बताया ! ये विकल्पहीनता की समस्या ही इसका सबसे बड़ा कारण है, अब तो यह बात सम्पूर्ण देश महसूस कर रहा है, पर समाधान क्या है ? मैं आपसे अपनी एक शंका का निवारण करना चाहता हूँ ? वह यह की इन सांसदों और विधायकों की उपयोगिता क्या है ? इनके कर्तव्य क्या हैं, और इनके अधिकार क्या हैं ? इन्हें क्यों इतनी सुविधाएं मिलनी चाहिए ? किसी अनैतिक आचरण या कर्तव्यहीनता की स्थिति में नौकरशाहों का केवल ट्रांसफर क्यों होना चाहिए, उन्हें नौकरी से क्यों नहीं निकालना चाहिए, प्रथम दृष्टया आरोप सिद्ध होते ही उनकी संपत्ति और उनका बैंक अकाउंट क्यों नहीं सीज होनी चाहिए ? जो जनप्रतिनिधि हैं, उन्हें इतनी सुरक्षा क्यों चाहिए ? अब समय आ गया है, देश को इन सभी बातों पर भी विचार करना चाहिए ? क्या लालच है, क्या आकर्षण है, क्या जादू है, जो ये देखते-देखते अपार संपदा के स्वामी हो जाते हैं ? क्या उन कारणों का विश्लेषण नहीं होना चाहिए ? कब तक हम कांग्रेस, भाजपा, सोनिया, मोदी, लालू, कलमाड़ी के जाल में फंसते रहेंगे ? सिंह साहब, अब विश्लेषण इस बात का होना चाहिए ! केजरीवाल ऐसी ही बातों को उठा रहे हैं ! क्या हम समझ पायेंगे ?

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

इस लिए जनता को दोष देना कहीं से भी उचित नहीं है जनता को जब भी मौका मिला उसने कांग्रेस को उसके आचरण का हमेशा जवाब दिया है लेकिन जब जनता के सामने कोई सक्षम विकल्प है ही नहीं तो जनता क्या करे ले दे कर फिर सत्ता कांग्रेस के हाथ में आ जाती है और फिर खेल आरम्भ होता है निरंकुशता का क्योंकि सत्ता का नशा ही ऐसा होता है ? जहाँ तक कांग्रेस की कमियों की बुराई करने की बात है वह सबके सामने है केवल नजरिये के जरूरत है क्योंकि पानी से आधा भरा गिलास,किसी को आधा खाली नजर आता है और किसी को आधा भरा हुआ क्योंकि जो घोटाले आज की तारिख में उजागर हो रहे है वह कोई नए नहीं है पिछले साठ वर्षों से यही सब कुछ हो रहा है इस बार मीडिया के कारण कुछ अधिक प्रचार हो रहा है ? आज श्री एस पी सिंह साब , शायद पहली बार मैं आपके विचारों से स्वयं की सहमति देख रहा हूँ ! सपष्ट रूप से , भारत में आज कोई भी नेता या पार्टी इस हालत में नहीं है की वो भारत के लोगों के मंसुबोबं और उनकी उम्मीदों पर खरी उतर सके ! कांग्रेस के पास अपने पुराने होने का एक फायदा है किन्तु वो ऐसा आचरण कर रही है की जैसे वो राजतन्त्र में है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय सिंह साहब ..एक अच्छा लेख .... मैइस बात से सहमत हु की ये संधिकाल चल रहा है.. और जनमत बनने की प्रक्रिया फिर एक बार शुरू हुई है .. वास्तव में जनता भ्रमित है .. वो विकल्प नहीं पा रही है , जितने उदाहरण आपने दिए .. सबमे सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य तो था पर कोई व्यवस्थित विकल्प नहीं था .. न ही जनमत का निर्माण प्रक्रिया पूरी हुई थी ... नेत्रित्वकर्ताओ ने प्रक्रिया को ही परिणाम मान लिया ..और खुद सत्ता की दौड़ में भागने लगे ... लोहिया जे.पी.. अन्ना सबके आन्दोलनों का यही हश्र हुआ ... पिछले आन्दोलनों ने समाजवादी शाशन बनाना लक्ष्य रखा और पैदा कर दिए लालू मुलायम ,, करूणानिधि जैसे महा सामंत .. केजरीवाल जी ने भी राजनीत i में आने की जल्दबाजी दिखा दी.. ये samay आत्मबलिदान का था पर केजरीवाल राम देव आत्म-मुग्धता के शिकार हो गए... इन आन्दोलनों से एक गतिशीलता बनी थी अब लोग चलना सीख रहे थे ...आवश्यकता इस बात की थी की इस गतिशीलता को तीव्र किया जाये ..जनमत को सरकार के खिलाफ नहीं बल्कि नयी व्यवस्था की तरफ जागरूक किया जाये ..इसमें समय लगेगा ..क्योकि विकल्प के बिना परिवर्तन फिर से अराजकता ही पैदा करेगा .... उम्मीद करते है की जल्द विकल्प सामने आएगा...

के द्वारा:

आदरणीय सिंह साहब                  सादर नमस्कार, सही कहा है आपने विकल्प कहाँ है?  यकीनन एक अच्छे विकल्प कि जरूरत है. मीडिया कुछ अच्छे तो कुछ बुरे लोगों का साथी बना हुआ है किन्तु जों भी हो दोनों हि बातें जनता के सामने आने लगी हैं अब जनता को सोचना है कि उन्हें करना क्या है?                  वैसे मुझे अब यह वक्त संधि काल कि तरह लगने लगा है और वह वक्त दूर नहीं जब एक अच्छा विकल्प आकार लेगा चाहे वह केजरीवाल से आये, स्वामी जी से आये या इन्ही दलों में से कुछ साफ़ छवि वाले लोगों के कारण आये.                 मुझे इस वक्त बहुत उपयुक्त लगता है कि आर एस एस भी यदि इस वक्त सिर्फ भाजपा के पीछे ना रहकर स्वयं राजनीति में खुलकर आये तो बड़ा बदलाव नजर आएगा. 

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय सिंह साहब आपके इस लेख में जो तारीफ़ के काबिल बात थी वो मैंने पहले ही कर दी परन्तु आप को भी पता है की आप लिखते ही गलत हैं जब आपकी कल्पना तक में सही आदमी गलत नज़र आते हैं तो फिर यथार्थ में तो न जाने क्या होता होगा............! आपके साथ ये दिक्कत है की आप को हर सही बात गलत नज़र आती है और फिर यदि कोई आपका विरोध कर दे तो आपसे सहन नहीं होता ............! मैं तो आपके लेखों पर स्पष्ट शालीनता से और तथ्यों के साथ विरोध दर्ज करता हूँ अन्यथा आपके पुराने लेखों ने कुछ लोगों ने टिप्पड़ियां पढने के बाद तो आप आप मंच छोड़ कर भाग गए थे ..........! मेरी समझ में ये नहीं आता की आप हमेशा गलत बातों को बिना तथ्यों के साथ क्यों लिखते इस से लोगों को गलत जानकारी मिलती है .......... ! आपकी तो कल्पना हो गयी और लोगों का सामान्य ज्ञान ही खराब कर दिया, हाँ हम मुहं जोरी भी करते हैं, क्योंकि कुछ लोगों को वाही भाषा समझ में आती है जैसे आप ........ आपने अपनी कल्पना में लिख दिया की "राजा हरी सिंह की गलती"..... एतिहासिक तथ्यों में कल्पनाएँ नहीं चलती, मैंने बीच में सोचा था की आपके लेखों पर प्रतिक्रिया न दूँ क्योंकि आप बच्चों की तरह चिढ़ते हैं आप तर्क कर ही नहीं सकते .......... परन्तु अब में आपके हर उस लेख पर अपनी टिप्पड़ी करूंगा जिसमें आप अनर्गल बातें या गलत प्रसंग रखेंगे क्योंकि.

के द्वारा: munish munish

प्रिय मुनीश जी आपकी भाषा ही आपके मन का मैल स्वयं ही कह देती है इस लिए मेरे कहने से कुछ नहीं होने वाला यहाँ न तो कोई प्रतियोगिता है और न साहित्य सम्मलेन जहाँ भाषा का शैली की शुद्धता का चयन होता है मेरे विचार से यह मंच स्थापित लेखकों और न लिखने वालों को सामान अवसर देता है जहां मुझ जैसा अनपढ़ व्यक्ति भी आप जैसे महान प्रतिभावान साहित्यकार के सानिध्य में अपने मन की भड़ास निकाल ही लेता है लेकिन शायद आपको यह गवारा नहीं क्योंकि आप लेख के भाव को नहीं बल्कि उसमे त्रुटियाँ ढूढते हैं / लेकिन आप कहते है आपको मुझसे कोई कटुता नहीं है तो मेरे लेख में केवल त्रुटियाँ ही क्यों निकाल लेते है / मैंने कश्मीर पर लागु धरा ३७० या यूनाइटेड नेशंस का कोई उल्लेख ही नहीं किया तो नेहरु जी बीच में कहाँ से आगये - इसलिए आपका उद्देश्य केवल एक हैं वह है दुष्प्रचार जिसके आप एक्सपर्ट है क्योंकि आपने अपने बचपन से ही यही सिखा है सीधी भाषा में इसे कहते है "मुंह जोरी" इस लिए मैं आपसे मुंहजोरी नहीं कर सकता अतः अगर आप मेरी कल्पना को कल्पना ही रहने दो तो आपकी कृपा होगी -- धन्यवाद

के द्वारा:

आदरणीय सिंह साहब, लगता है आपका हर विषय पर पहले से ही माइंड सेट रहता है, जो आपने लिखा की मुझे आपसे व्यक्तिगत कटुता है आप किसी विषय पर विचार नहीं करते चिंतन नहीं करते, वर्ना उक्त टिप्पड़ी में आपसे कौन सा कटु शब्द कहा गया है या आपका अपमान किया गया है कृपया बताएं यदि कुछ हुआ और आपने स्पष्ट किया की आपका कहाँ अपमान हुआ तो मुझे आपसे माफ़ी मांगने पर कोई संकोच नहीं है, उक्त टिप्पड़ी को पढ़कर कोई भी ये नहीं कहेगा की मैंने आपसे कोई बैर निकाला है या आपकी बुराई की है हाँ ये आपका कहना की आपने कोई इतिहास नहीं लिखा और घटनाक्रम में त्रुटी हो सकती है तो आदरणीय सिंह साहब कभी कभी छोटी छोटी सी त्रुटियों से अच्छा भला आदमी बदनाम हो जाता है और गलत आदमी हीरो बन जाता है, वैसे भी आप मुझ से कहीं ज्यादा अनुभवी हैं समझदार हैं इसलिए नीतिगत बातों मैं तो आपके सामने बच्चा ही हूँ इन सब बातों को आप मुझसे कहीं बेहतर समझते हैं.......! मुझे पता है की मेरे विचार आपके विचारों से मेल नहीं खाते इसलिए मैंने आपके किसी भी वैचारिक लेख पर टिप्पड़ी करनी बंद कर दी है क्योंकि आप किसी भी विरोध को सहन नहीं कर पाते हैं और तथ्यों पर बहस करने से बचते हैं यहाँ इस मंच पर किसी की भी किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है यहाँ सब अपने विचारों को प्रेषित करते हैं और इसी भावना के साथ एक खुले मंच पर आते हैं की अपने विचारों को सार्वजनिक कर सकें तथा अपने विचारों से लोगों को जोडें, यहाँ कोई लेखन का पैमाना किसी का नहीं नापा जा रहा न ही किसी रचना का साहित्यिक द्रष्टिकोण देखा जा रहा है न ही मैं या आप साहित्यिक द्रष्टि से लेखक के पैमाने पर खरे उतरेंगे. हम सब अपने विचार रख रहे हैं जो हमारे समर्थन में हैं उसका तो हम धन्यवाद दे रहे हैं लेकिन कोई विरोध करता है तो कहते हैं की कोई व्यक्तिगत कटुता है ये तो आपने कांग्रेसियों की सी बात कर दी की हाँ में हाँ मिलाते रहो तो ठीक वर्ना हमारी तुम्हारी दुश्मनी है और तुम्हारे पीछे C B I छोड़ दी जायेगी आदरणीय सिंह साहब कृपया पूर्वाग्रह का चश्मा उतार दीजिये मैंने इस टिप्पड़ी में आपका कहीं अपमान नहीं किया है और आपने स्वयं बताया की आप आज़ादी से पहले आये थे इस हिसाब से आप मेरे से दोगुने बड़े हो गए तो ये सब बातें तो आपको कहनी चाहिए और खुली बहस का समर्थन करना चाहिए परन्तु आप विरोध को सहन नहीं कर पाते हैं ...............!

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: munish munish

श्री सिंह साब नमस्कार ! अगर एक गाँधी , बेरिस्टर गिरी छोड़कर देशहित के लिए आगे बढ़ता है तब उसे राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित जाता है ! लेकिन जब एक अरविं केजरीवाल अपने रसूख को छोड़कर देश हित में उतरता है तो इतने सवाल क्यूँ खड़े हो जाते हैं ? मोती लाल और जवाहर लाल नेहरु , विलासिता का जीवन जीते जीते इस देश के महा नायक बन जाते है तब कोई सवाल क्यूँ नहीं ? इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री बन ने से पहले ही इतनी विदेश यात्राएं कर डाली थीं की जितनी प्रधानमन्त्री १० साल में भी नहीं कर पता , तब कोई सवाल क्यूँ नहीं ? आपके लेखन की तारीफ करूँगा किन्तु आपसे अनुरोध करता हूँ इन बातों को व्यक्तिगत मत लीजियेगा !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय निशा जी एवं श्री जे एल सिंह साहेब, आप दोनों की टिप्पणी बिलकुल १०० प्रतिशत सही है मैं भी अभी तक इन दोनों आंदोलनों के विषय में यही कहता रहा हूँ कि किसी भी सड़ी गली व्यस्था या भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जनता केवल उन्ही लोंगो पर विश्वाश कर सकती है जो स्वयं साफ़ सुथरे ही नहीं नेतृत्व करने कि क्षमता भी रखते हो. लेकिन वर्तमान आंदोलनों के कर्णाधार केवल श्री अन्ना हजारे को छोड़ कर एक भी ऐसा व्यक्ति नही है जो भारत जैसे विशाल देश को नेतृत्व देने कि क्षमा रखता हो और तो और वर्तमान में तो अभी जनता के दरबार तक पहुंचे ही नहीं है आपस में ही मतैक्य नहीं है वैसे भी इस भंग टीम में देश हित से बड़ा स्वयं का ही हित दिखाई देता है === टिप्पणी के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

आदरणीय दिनेश आस्तिक जी नमस्कार यह तो आपका अन्याय है की आप अपने इंतनी सारे इल्जाम लगा दिए है इतिहास में वर्णित घटनाओं पर भी किन्तु मेरा इतना कहना की "माना कि वर्ष १९८४ में स्वर्गीय इंदिरा गाँधी कि ह्त्या के बाद हुए एक ख़ास वर्ग (सिखों) के विरुद्ध दंगे जिसमे हजारों लोगों को क़त्ल ही नहीं बेबस बच्चों और महिलाओं को भी जला कर मार दिया गया था , किसी भी सभ्य देश के लिए उचित नहीं थे परन्तु वर्ष २००२ गुजरात के गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में एक डब्बे में यात्रा कर रहे लोगों को जला कर मार देने कि घटना उससे भी अधिक जघन्य आपराध कि श्रेणी में आती है लेकिन उसकी परिणिति में सरकारी मशिनिरी द्वारा प्रायोजित दंगे उससे भी अधिक नराधम अपराध कि श्रेणी में शुमार होते हैं इसलिए गुजरात के मुख्य मंत्री श्री नरेन्द्र भाई दामोदर भाई मोदी जी को बधाई इस बात की कि उनके लाख चाहने के बाद भी गोधरा के साबरमती काण्ड के बाद सरकार के गुर्गों के द्वारा प्रायोजित दंगों का सच उनके अपने कार्यकाल में ही देश प्रदेश और जनता के सामने आ ही गया है जिसके लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक अहम् भूमिका निभाई जिसने राज्य सरकार की लचर मशीनरी से ही दूध का दूध पानी का पानी वाली कहावत चरितार्थ करवा दी अन्यथा गुजरात की सरकार और प्रशासन तो पांच वर्ष तक लिपा-पोती ही करता रहा था और अगर माननीय सर्वोच्च नयायालय का हस्तक्षेप नहीं होता तो यह सच कभी भी जनता के सामने नहीं आ सकता था" आपको इस पुरे कथन में प्रायोजित शब्द गलत लगा है बंधुवर आपसे केवल इतना अनुरोध है की अगर सर्वोच्च नयायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं करता तो क्या सरकारी मशीनरी यह सब कर देती ? इस लिए प्रत्यक्ष से मुंह मोड़ना उचित नहीं ? वैसे यह जरूरी नहीं की सबलोगों का मत एक हो - यह मेरा विश्लेषण है कोई कहानी या कथा नहीं लिखी है मैंने / मैं आपके मत विचार का स्वागत करता हूँ और आपसे अनुरोध भी है की भावना और सच में अंतर होता है और विश्लेषण में केवल तथ्य होतें हैं मेरा विश्लेषण तथ्य पर आधारित है इस लिए गोधरा के साबरमती ट्रेन घटना के बाद हुए दंगे ( या देश में किसी भी घटना के बाद उसके विरोध में ह्युए दंगे की मैं हमेशा निंदा करता हूँ ) क्या कानून की परिभाषा में न्यायसंगत हैं अगर हैं तो आप सही हैं और मैं गलत - लेकिन आपको एक बात हमेशा याद रखनी होगी की भारत एक स्वतंत्र देश है जहाँ जाति -धर्म भेद के बिना कानून का शासन है यह बात और है की कानून को कुछ लोगों अपनी बांदी बना लिया है ? धन्यवाद

के द्वारा:

यह कैसी राजनीति, यह कैसा न्याय, नेता जी को नेपथ्य में धकेलने वाले को शासन, चन्द्रशेखर आजाद को एल्फ्रेड पार्क में घेरने  वाले पुलिस अधिकारी का आजादी के  बाद उत्तर प्रदेश की पुलिस कमान सौंपना, भारत माँ को डायन कहने वाले  को मंत्री  पद देना। भगत जैसे नकली नोंटो का कारोबार करने वालों को केन्द्रीय मंत्रालय में शामिल  करना सिक्ख दंगों में प्रमाणिक रूप से शामिल होने वाले जगदीश एवं सज्जन को विभिन्न  पदो ं की शोभा बढ़ाना। बस्तर में द्वारका प्रसाद मिश्र द्वारा केन्द्रीय के निर्देश पर हजारों  अपना हक माँगते आदिवासियों को गोलियों से भूनकर उनकी लाशों को कुओं में डालकर उन कुँओं का बाट देना। लाल बहादुर शास्त्री की संदेहात्मक मृत्यु का रहस्य बना कर रखना। जय प्रकाश नारायण जी को सिलो प्वाइजन देकर उनके गुर्दे खराब कर देना। बफोर्स काण्ड में न्याय प्रकिया को प्रभावित कर स्वयं बेदाग बरी हो जाना, चारा घोटालों में लालू जी को बचाना। आदरणीय सिंह साहब क्या आप इस पर प्रकाश डालेंगे। न तो मैं बीजेपी का समर्थक हूँ और न ही नरेन्द्र मोदी की वकालत करने वाला कोई वकील। किन्तु आपका यह कहना कि गुजरात दंगा पूर्णतः प्रायोजित था। मिथ्या है। क्षमा चाहता हूँ मुझे यह शब्द प्रयोग करना पढ़ रहा है कि आपकी सोच संकुचित है। मेरा आपसे कोई विरोध नहीं है, लेकिन आपके अतार्किक विचारों से विरोध है। इस तरह के विचार समाज में भ्रम पैदा करते हैं। लोंगो को सच्चाई से दूर करते हैं। और आपस में वैमनस्यता पैदा करते हैं। काँग्रेस भारतीय राजनीति की खलनायक है कृपया इस पर भी विचार कीजिये। इस पर भी लिखकर अपने लेखक धर्म का पालन कीजिये। इस तरह की अंध भक्ति देश के लिये तथा मानव सभ्यता के विकास के लिये विष के समान है। काँग्रेस एक सोने का नाग है। जिसके अंदर जहर के अतिरिक्त और  कुछ नहीं मिलेगा। जहर भी भ्रष्टाचार रूपी, भारतीय जन का बाँट कर शासन करने का जहर, अपराधियों  को पनाह देने का जहर.......लिखना तो बहुत था लेकिन समयाभाव सबसे बड़ी बाधा है.....

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय एस. पी. सिंह साहब                               सादर नमस्कार, ऐसी कटु प्रतिक्रियाएं तो आपको प्राप्त होना ही था. जब तक हिन्दुस्तान में सरकारें हिन्दू की बजाय मुस्लिम के लिए अधिक चिन्तित  रहेगी हिन्दू अपने ही देश में पराया सा महसूस करेगा, ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती ही रहेगी. मगर यकीन मानिए मुझे हिन्दू होने के नाते  नरोडा के दोषियों को मिली सजा से ठेस पहुंची है. क़ानून  ने अपना कार्य किया उस क़ानून ने जिसे हम अंधा क़ानून मानते हैं. यदि क़ानून गोधरा की घटना को भी देख सकता तो शायद इन लोगों को इतनी बड़ी सजा ना होती. किन्तु  क़ानून में भरोसे की बात करें तो इस बात का तो अवश्य ही भरोसा हुआ है की क़ानून अंधा होता है. देश के राजनीतिज्ञों को सिर्फ अपने काले धन की ही चिंता है इसके लिए वे मुस्लिमो को कुत्ते की तरह पालते हैं और मुस्लिम भी  सच झूठ को जाने बिना हर चुनाव में अपने मालिक के प्रति वफादारी निभाते हैं.जब तक हमारे देश के इन भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को  ही म्रत्यु दंड नहीं दिया जाएगा तब तक हिन्दू मुस्लिम तो हमेशा ही लड़ते ही रहेंगे और कभी कोई किसी के ज्यादा लोग मारेगा तो कभी कम. और हम अंधे कानून से मिली सजा पर खुशियाँ मनाते रहेंगे क्योंकि न मारने वाला हमारा रिश्तेदार था और नाही मरने वाला. 

के द्वारा: akraktale akraktale

वाह सिग साहब, आपकी कांग्रेस परस्ती की दाद देनी पड़ेगी ! गुजरात दंगा तो आपको प्रायोजित लगता है लेकिन 1984 के सिख-संहार पर आप आँखें बंद कर लेते हैं ! जब की अनेक नेताओं, केंद्र में मंत्री तक रहे रसूखदारों यथा सांसद सज्जन कुमार /ललित माकन / जगदीश टाइटलर / एच के एल भगत / आर के आनंद ( सभी नानावटी आयोग द्वारा आरोपित ) के नाम अग्रिम पंक्ति में हैं ! फिर यह तो जग जाहिर है की सिख-नरसंहार पूर्णतया कांग्रेस द्वारा प्रायोजित था ! स्वर्गीय राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद दंगों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था " जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलाता ही है " आशय स्पष्ट है ! फिर 18-feb-1983 का नेल्ली ( असम ) नरसंहार जिसमें हजारों बंगलादेशी मुसलमान गुस्पैठिये मारे गए थे हितेश्वर सैकिया के कांग्रेसी शाशन काल में ! वह किसके द्वारा प्रायोजित था ? मान्यवर ,दंगे तो कैंसर के सामान हैं इस तरह के नर-संहार लोकतंत्र पर बदनुमा दाग हैं ! इंसानियत पर कलंक ! क्रूरता का चरम है यह कृत ! इसकी हर देशवासी को निंदा करनी चाहिए,लेकिन आँखें खुली रख कर बंद आँखों से नहीं !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

माननीय सिंग साहब ! लोकतंत्र में अपनी बात रखने / कहने का सबको अधिकार है ! आज यह सत्य किसी से नहीं छुपा की वर्त्तमान राजनेता कितने नैतिक हैं ? इनकी करतूतों की ढोल तो बजनी ही चाहिए, वर्ना देश की गूंगी-बहरी जनता कैसे चेतेगी ? यदि इंतज़ार करते रहेंगे तो ये कमबख्त देश को ही बेच खायेंगे ! मान्यवर क्षमा-प्रार्थी हूँ , यह मेरी गर्वोक्ति कत्तई नहीं थी ! मैं तो आपको स्पष्ट करना चाहता था की गुजरात अब पहले वाला गुजरात नहीं रहा ! रहा सवाल २००२ के दंगों के कारण राज्य के ३२ लोगों को सजा मिल रही है ! और यह मोदी शासन की पोल खोलता है !........तो आदरणीय , राज्य के दंगों में एक ही समुदाय के ३२ लोग दोषी पाए गए ! क्या यह आपको अटपटा नहीं लगता ? शायद न भी लगे , सबका अपना-अपना नजरिया है ! फिर अयोध्या वाली ट्रेन में आग भी स्वयम ही लगी होगी ,क्यों की ऐसी आग तो लगती रहती है ! अभी हाल ही में मुम्बई / कानपूर / लखनऊ में भी लगी थी ! और जहाँ तक सजा का प्रश्न है तो सजा तो मोदी को भी हो सकती थी ! कदाचित देश देख रहा है की किस प्रकार मायावती को कोर्ट ने क्लीन चिट दे दी दूसरी ओर विपरीत परिस्थितियों के चलते पश्चिम बंगाल में बहुमत से पारित अध्यादेश को कोर्ट द्वारा गलत ठहराया गया !यही परिस्थितियां मोदी के समक्ष उत्पन्न हो सकती थी ! लेकिन , गुजरात में मोदी के वर्चस को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता ! बहुसंख्यक समुदाय की महिलाएं /लड़कियाँ गुजरात में कुपोषण की शिकार ? महोदय , कुपोषण की मार तो पूरा देश झेल रहा है ,तो इसके लिए किसे दोषी मानते हैं आप ...मोदी को ? देश के साठ फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषण के शिकार हैं यह एक कड़वी सच्चाई है ! कौन ज़वाबदार है ....क्या मोदी ? बहुत से अनुत्तरित प्रश्न हैं जो इस नाकारा नेतृत्व से पूछे जाने हैं !लेकिन दुर्भाग्य ......! माननीय सिग साहब , विकास स्वयं बोलता है ! उद्योग स्थापित होंगे तो लोंगों को आजीविका के साधन उपलब्ध होंगे /रोज़गार मिलेगा और जब रोज़गार मिलेगा तो हालात सुधरेंगें ,सम्बन्ध बनेगें ,तब अमन-चैन होगा !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

प्रिय राजू आहूजा जी जब आप यह समझते है की सरकार बी जे पी की किसी मांग को नहीं मान सकती तो फिर आन्दोलन का क्या मतलब इन्तजार करो २०१४ का, दूसरी बात यह है की आप की गर्वोक्ति की मैं गुजरात नहीं गया तो क्या मुझे गुजरात की बात करने का हक़ नहीं है चलो मैं आप से ही एक बात पूंछ सकता हूँ की २००२ में मारे गए ९७ लोंगो के ३२ आपराधियों को आज सजा भी मिल जायगी तो यह उस सुशासन की पोल स्वयं ही खोल देता है की गुजरात में कैसा सुशासन है - और जिस प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी की महिलाओं और लड़कियां कुपोषण का शिकार हो तो विकास की कहानी स्वयं सिद्ध हो जाती है हाँ विकाश है वह केवल संपन्न लोगो का ही है और वह आज से नहीं है वह पहले से ही था ? आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

के द्वारा:

आदरणीय एस पी सिंह साहब                     सादर नमस्कार, सच्चाई कडुवी जरूर है मगर सत्य तो यही है की दोनों ही प्रमुख राजनितिक दल, दल दल की भेंट चढ़ गए हैं और इनका उद्धार भी मुश्किल है. मगर जब आप मोदी के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं तो क्या राजा कलमाड़ी जो जेल चुके हैं तो क्या प्रधानमन्त्री ने इस बात के लिए इस्तीफे की पेशकश की थी. यदि ऐसा है तब तो मोदी का भी इस्तीफा मांगना ठीक है.   आपकी इस बात से मै सहर्ष सहमत हूँ की बीजेपी अब संसद भंग करने की ही बात करे. पूरा देश इन भ्रष्टाचारियों के चहरे देख देख कर उब चुका है अब कुछ नए चहरे सामने आना चाहिए. लोगों को चुनाव के खर्च दिखाकर सरकार डराने की कोशिश ना करे. यह खर्च लूट की रकम से बहुत ही कम है. 

के द्वारा: akraktale akraktale

मान्यवर सिंग साहब,सर्वप्रथम यह बताएं की भाजपा द्वारा संसद भंग कर मद्याविधि चुनाव की मांग को कांग्रेस स्वीकार कर लेगी ? क्या अन्य दल इसे हज़म कर पायेंगे ? कदाचित कत्तई नहीं ,सिरे से नकार दिया जायेगा ! दोषी की बर्खास्तगी की मांग ही तर्क-सांगत है ! रहा सवाल मोदी के बचाव का तो मैं आपसे छोटा सा उत्तर चाहूँगा,क्या आप ( मोदी शासन में ) कभी गुजरात गए हैं ? यहाँ मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आप गुजरात नहीं गए ! वर्ना आप ज़मीन से जुडी बात करते इस तरह हवा में नहीं ! दरअसल मोदी ( या मोदी जैसे नेतृत्व ) को गुजरात में बने रहने के लिए किसी आलाकमान के सहयोग की कत्तई ज़रूरत नहीं ! यह काम तो गुजरात की जनता बखूबी निभा रही है ! और आगे भी निभाएगी ! क्यों की वह जानती है की मोदी से अच्छा नेतृत्व वर्त्तमान परिपेक्ष में मोदी के अतिरिक्त और कोई दे ही नहीं सकता ! यह मत मात्र हिन्दू वोटरों का ही नहीं बल्कि अमन पसंद मुसलमान वोटर भी मोदी को उतना ही पसंद करते हैं ! आज आम आदमी राजनैतिक दाव-पेंचों से भली-भांति वाकिफ है ! दोगली राजनीती के बजाय वह शान्ति और विकास चाहता है जो उसे वहां मिल रहा है !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

परम पूजनीय विष्णु जी महाराज आपसे अनुरोध है की प्रतिक्रिया स्वरुप कमेंट्स लिखने में कंजूसी न करे खुल कर लिखे और बताएं की आप क्या क्या लिख सकते है एक ही कमेन्ट को कई लेखो पर चिपका देना कहाँ की क़ाबलियत है ? आपने मेरी जाति तो बता दी कांग्रेस पर अपनी नहीं बताई तो यह बात तो निश्चित है आप वही होंगे जो इस देश में अराजकता फैलाना चाहते है - भैया जी मैंने अपने लेख में न तो मोदी का नाम लिया है न ही किसी और का केवल यू ० पी० ऐ ० और एन० ड़ी० ऐ० का ही नाम लिया है तो क्या आपकी स्थिति बिलकुल वैसी नहीं है जैसे की कहावत है बिल्ली को ख़्वाब में भी छिछ्ड़े नजर आते है ? आपसे अनुरोध है की आप लेख पर जी भर के कमेन्ट कीजिये लेकिन लेख से सम्बंधित हो तो मजा आएगा ? अन्यथा क्यों अपनी ताकत बेकार करते है ?

के द्वारा:

आदरणीय एस पी सिंह साहब                                   सादर नमस्कार, आपने व्यंगात्मक तिरंगे आलेख पर मै कहना चाहूँगा कि माया हो या मुलायम इनको दगाबाजी कि आदत पड़ चुकी है. शायद ऐसी ही राजनीति के लिए उत्तर प्रदेश राजनीति का गढ़ कहाता हो.                                 बाबाजी क्या कोई भी भला मानस यदि भारत में व्यापार करना चाहेगा तो वह लाख ईमानदार हो सरकार यदि चाहेगी तो उसमे कहीं ना कहीं खामी दिखाने में सफल हो ही जायेगी. रामदेव जी जिस उद्देश्य के लिए लड़ रहे हैं उससे संसद में बैठे कई राजनेता प्रभावित होना ही हैं इसलिए वे झूठ को सच साबित करने में पावर का पूरा उपयोग करेंगे.                                  चोर चोर मोसेरे भाई. इनके बारे में कुछ बोलना कि जरूरत नहीं है. कुर्सी सबको प्यारी है. यदि ऐसा नहीं होता तो जनानी जात का दादी मुछ वाला सरदार नहीं होता. 

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय सोहन पाल सिंह साहब                             सादर नमस्कार, आपने CAG को जों काग बना दिया है उसके लिये आपका शुक्रिया. बात यदि हम सिर्फ अमाउंट कि करें तो मुश्किल होगी क्योंकि कल और आज के मूल्यों में बड़ा परिवर्तन हो चुका है किन्तु इससे वह जुर्म कम नहीं होगा जिसकी कुछ कुछ झलक इनकी रिपोर्ट में दी गयी है. अब इसके बाद सरकार यह कहे कि  PAC पाक  रिपोर्ट आने दो तो सही है भाई इनको पाक साफ़ बताने वाली रिपोर्ट का अवश्य ही इन्तजार होगा. हमेशा से यही तो होता आया है डायलुट पर डायलुट करते जायेंगे और फिर कहेंगे मुफ्त में ही बदनाम कर रहे हैं. विपक्ष पूरी तरह फूटा घडा साबित हो रहा है वो क्या रोक सकेगा इनको. कभी नहीं कुछ दिन कि चिल्लाचोट के बाद सब शांत. 

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: annurag sharma(Administrator) annurag sharma(Administrator)

भरोडिया जी,नमस्कार,   ज़नाब एस.पी.सिंह साहब के दूसरे लेख भी देख लीजिये ,आप को अपने प्रश्न का उत्तर एवं इनकी मानसिकता का परिचय दोनों मिल जायेगा।    बाहर से आए हुये अतिथियों का आदर सत्कार अगर हमारे जयचंदी भाई लोग नहीं करेंगे तो  नवाबों,सुल्तानों की शानदार हुकूमत फिर कैसे आयेगी? आवश्यकता होने पर ये लोग मात्र अपनी रोटी ही नहीं बेटी भी देंगे और अपनी शान भी समझेंगे।अपने कश्मीरी भाई कश्मीर से भगा दिये जाते हैं, महा राणा प्रताप को जंगल मे घास की रोटी भी नसीब नहीं होती और ये बाहर से आये लोगों के साथ दुर्व्र्यहार से व्यथित हो जाते हैं।     असम ही नहीं इरान,इराक़,अफगानिस्तान आदि देशों की भी घटनाओं का खामियाजा इलाहाबाद,कानपुर, लखनऊ आदि के नागरिकों क्यों भुगतना पड़ता है इस बारे इन लोगों का मौन व्रत प्रारम्भ हो जाता है।

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

वाह क्या आइडिया है सर जी..... "भ्रष्टाचार करने वाले नेताओं पर जनता स्वयं ही कार्यवाही ( डाईरेक्ट एक्सन के द्वारा ) करके जनता की आदालत में ही देश द्रोह का मुकदमा चला कर इन लोगों को चौराहों पर फांसी पर ही लटका जायगा —— एसपी सिंह.मेरठ"  वाह क्या दर्शन है क्या विचार है! दोनो आन्दोलनों में, उनको चलाने वालों में कमियां ही कमियां थीं या हैं। या तो उनको  जन समर्थन नहीं मिला या जो जन समूह इन आन्दोलनों मे भाग लिया था वो "अधिकांश भाग सांस्कृतिक संघठन के अनुशासित स्वयंसेवकों का ही था" जन सामान्य नहीं था।         कोई हिंसा नहीं, मात्र आग्रह ,सत्याग्रह पूरी तरह अनुशासित लेकिन वह सब गलत था। और अब जनता की अदालत मे देश द्रोह का मुकदमा चला कर इन लोगों को चौराहों पर फांसी पर लटका देने को धांसू आइडिया.....वाह क्या आइडिया है सर जी.....लेकिन हाजमौला सरररररर     

के द्वारा:

प्रिय भाई, योगी जी प्रणाम, इस विषय पर मेरा भी तो यही कहना है की जैसा आपको अनुमान होता है शायद मुझे ऐसा नहीं लगता क्योंकि मेरे विश्लेषण के अनुसार जिस प्रकार एक ठोस मुद्दे को अन्ना के नाम से लोगों को उद्वेलित किया और फिर ऐसे मुद्दों को उठाया गया जो गलत तो नहीं कहे जा सकते परन्तु किसी भी सरकार को उनको मानना आत्म हत्या करने के सामान ही था और इसको आन्दोलन चलाने वाले भी बाखुबी जानते थे फिर भी उनको उठाया गया / इस लिए आन्दोलन चलाने वालों की समझ को क्या कहा जा सकता है जैसा मने कहा है जनता के लिए किये गया कोई भी आन्दोलन का अंत वोट के चिंता पर समाप्त होता है जो प्रत्यक्ष ही दिख रहा है ? ब यह तो समय ही बताएगा की कौन विकल्प बनता कौन नहीं वैसे राजनीती संभावनाओं का ही खेल है हर कोई अपनी संभावना तलाश करने के लिए स्वतंत्र है और हमारी सहानुभूति उनके साथ है ? धन्यवाद.

के द्वारा:

भाई दिनेश जी शायद आपने इस लेख के आरम्भ में लिखी दो लाईने पढ़ी नहीं है नोट::: आदरणीय पाठक एवं ब्लागर बंधुओं यह पोस्ट मैं जागरण मंच द्वारा “Jagran Junction Forum” इसी विषय पर आमंत्रण के अंतर्गत लिख रहा हूँ कृपया मेरे विचार और विश्लेषण उसी सन्दर्भ में ले / धन्यवाद" बंधुवर यह आलोचना नहीं अपितु विश्लेषण है क्योंकि इन दोनों आंदोलनों का जो होना था उसका विश्लेषण मैंने पहले से ही कर दिया था आप मेरी इस बात को भी अगर सही नहीं मानते तो यह बात अलग है, मैं आपसे विश्वाश पूर्वक कहना चाहता हूँ की मैं किसी भी आन्दोलन के खिलाफ तो कभी स्वपन में भी नहीं हो सकता परन्तु जो मेरे सामने है उसको कैसे झुटला सकता हूँ और सच को कहने में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती, सवाल समर्थन और समर्थन में लिखने का है जब समय आएगा वह भी हो जायगा ? धन्यवाद. s.p.singh,meerut

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

आदरणीय सिंह साहब, सादर ! आपका विश्लेषण बहुत हद तक सही है ! वैसे जो हुआ ठीक ही हुआ, जो होगा वह भी ठीक ही होगा ! बस एक ही बात खली कि अन्ना जी को छोड़कर बाकी लोग बात को या इस समाधान को देश के समक्ष सही तरीके से प्रस्तुत नहीं कर पाए ! और न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि अन्ना जी की सहमति इस सारी प्रक्रिया में दिल से नहीं थी ! ऊपर से भले ही उन्हों ने समर्थन किया, पर उनके चेहरे की भाव-भंगिमा इस बात की तरफ इशारा कर रही थीं कि वे अंतर्मन से इस फैसले के यूं प्रस्तुत किये जाने के पक्ष में नहीं थे ! और शायद यही कारण है कि वे चुनाव में सक्रीय भागीदारी नहीं निभायेंगे ! लेकिन एक बात के लिए अन्नाजी की दाद देनी पड़ेगी कि कितने कुशल सेनापति की तरह उन्हों ने सार्वजनिक रूप से कहीं भी अलगाव झलकने नहीं दिया ! वरना ये कांग्रेसी........!!!!! सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

प्रिय योगी जी मेरा कहने का तात्पर्य केवल इतना है की जब आपको राजनीती में आना ही था तो फिर इतना घुमाफिरा कर क्यों सीधे -सीधे प्रवेश करते आप को कौन रोकता था - जनता को क्यों भ्रमित करते है सवाल यही है की क्या समाज को किसी और दुसरे तरीके से नहीं बदला जा सकता क्या अन्ना ने आपने गावं में जो कुछ किया है वह हम और आप नहीं कर सकते यह कथित सिविल सोसाइटी नहीं कर सकती - हाँ आपकी बात सही है फिर भी कुछ बदलाव तो अवश्य ही आएगा राजनितिक लोगो की बिरादरी में कुछ लोगो की संख्या और बढ़ जायगी - देश की हालत तब तक नहीं बदल सकती जब तक हमारे समाज की सोंच और कार्य शैली नहीं बदली जायगी - यहाँ रिश्वत देकर काम करवाने वाला भी उतना ही दोषी है जितना लेने वाला दोषी है ? इस लिए समाज को बदलने का रास्ता संसद के भीतर नहीं है संसद के बाहर है समाज को जागरूक करके / इस लिए अन्ना हजारे आज भी सही है (अपने व्यक्तव्यों के अनुसार ) लेकिन टीम गलत है यही मेरा कहना है ?

के द्वारा:

प्रिय रविन्द्र जी आपने सही कहा - जैसे मैंने पहले भी कहा है देश में अब तक जितने भी आन्दोलन गरीब भूख, भ्रष्टाचार को केंद्र रख कर किये गए है या तो वह असमय ही काल के गाल में चले गए या फिर उसकी मंजिल ही राजनितिक गलियारा रहा है जिस कारण से और टीम अन्ना ने तो संसद की सर्वोच्चता को स्वीकार कर लिया है अब केवल बाबा राम देव बचते है वह भी शीघ्र ही जब अपनी राजनितिक पार्टी की घोषणा करेंगे तो वह भी संसद की सर्वोच्चता को स्वीकार करते नजर आयंगे ? लेकिन आज जनता जिसको एक आस जगी थी की कोई गैर राजनितिक संघठन उनके हित के लिए बिना हथियार उठाये लड़ने को तैयार है तो उनके कष्टों का निवारण अवश्य होगा आज उनके लिए अन्धकार के सिवाय कुछ नहीं है - लेकिन ऐसा भी नहीं है यह देश वीरों से खाली नहीं कोई फिर आएगा -

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

सिंह साहब, नमस्कार. जब से टीम अन्ना ने राजनीति में आने की घोषणा की है मैं सोच रहा हूँ की ऐसा क्योँ हुआ ? राजनीति में आने के बाद क्या टीम अन्ना के पास इतना समय बचेगा के वो आम जनता की कठिनाइयों के बारे में काम कर सकें. जिस कांग्रेस को भ्रष्टाचार का सिरमोर कहा जा रहा है उसी कांग्रेस में कभी महात्मा गाँधी, सरदार पटेल. नेहरु और शास्त्री जी जैसे नेता थे, लेकिन आज वही कांग्रेस भ्रष्टाचार का पोषण करने में लगी है. टीम अन्ना संसद में जाये मुझे ऐतराज नहीं लेकिन क्या सत्ता पाते ही ये बौरा नहीं जायेंगे ? क्या टीम अन्ना में सीटों के लिए मारामारी नहीं होगी ? वो हर काम के लिए जनता के बीच जाने की बात कर रहें हैं. लेकिन जो जनता जेल में बंद अपराधी को जीता देती है वो टीम अन्ना को ईमानदार उम्मीदवार दे सकेगी. ग्रामसभा को भी अधिकार देने की बात भी की जा रही है.झूठी शान के लिए बच्चों को मार देने में ग्रामीणों का समर्थन भी होता है. बिजली चोरी करने वाले, निम्न जाति के लोगों पर दबंगता दिखाने वाले, जोड़तोड़ करके सरकारी सुविधाओं पर कब्ज़ा करने वाले ग्राम सभा से सम्बंधित ही होते हैं. बेहतर होता के टीम अन्ना संसद से बाहर रहा कर ही शोषित, दमित लोगों के लिए आवाज उठाती. सत्ता, ताकत हर व्यक्ति को भ्रमित करतें हैं. सिंह साहब इतने विस्तृत विश्लेषण के लिए आप को बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएं. नमस्ते जी.

के द्वारा: Ravinder kumar Ravinder kumar

आदरणीय जे एल सिंह साहेब आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. आप और आप जैसे और बहुत से सज्जन व्यक्तियों की सुभकामनाओं के सहारे ही मैं बाथ रूम सिंगर की श्रेणी का व्यक्ति मंच पर कुछ लिख पता हूँ ? आपसे मैं यह कहना चाहता हूँ की मैंने बार बार यह कहा है लिखने की मेरी यह शैली है जिसमे न तो मैं विरोध करता हूँ न समर्थन मैं केवल विषय वस्तु का विश्लेषण किया करता हूँ जो मेरे अपने आंकलन पर खरा उतरता है लेकिन यह सही है की कुछ अति उत्साही लोगो को बुरा या भला लग सकता है ? चूँकि मेरे अधिकांश लेख बाबा राम देव और अन्ना हजारे से ही सम्बंधित है तो उनके समर्थकों और अनुयायिओं को बुरे लगाने स्वाभाविक ही है उसके लिए मैं किसी प्रकार का उत्तरदायी नहीं हो सकता ? लेकिन यह सच है की मेरे आंकलन सौ प्रतिशत सही हुए है. जैसे जब बाबा राम देव ने आरम्भ में यह कहा की अगर मेरी जान को खतरा है और कुछ हो जाता है तो सरकार जिम्मेदार होगी तो मैंने एक लेख लिखा था "" बाबा को असुरक्षा की भावना क्यों "" उनके पास धन दौलत तो है नहीं तो है क्या केवल एक धोती और लंगोटी - के लिए कोई उन्हें मार देगा - फिर मैंने लिखा था की बाबा की ऐसे मांग में किसी नेता की छटपटाहट दिख रही है बाबा नेता जरूर बनेंगे जब बाबा ने काले धन की बात की तो मैंने उपलब्ध सुचना के आधार पर यह कहा था की अब बाबा सरकार के आयकर विभाग के रडार पर आ जायंगे जो आगे चल कर सच हुआ और अब बाबा आयकर चक्कर में उलझे हुए है और उनका एक साथी जेल भी पहुँच गया है क्या यह आंकलन गलत था ? जो आज सच हो रहा है ९ अगस्त के बाद वह कभी भी अपनी पार्टी की घोषणा कर सकते है ? अब रही बात अन्ना और उनकी टीम की तो इस बात में कोई शक की बात नहीं है की इन्होने एक अति महत्त्व पूर्ण जन जन के मुद्दे को बहुत अच्छी तरह से उठाया है आज भारत ही नहीं दुनिया भ्रष्टाचार से जूझ रही है लेकिन अपने देश में कुछ अधिक है लेकिन सच आज आपके सामने है ? जब मैं बात संविधान की करता हूँ तो लोगों को बुरा लगता है आप ही बताएं की जब देश का व्यक्ति एक संवैधानिक व्यस्था के अंतर्गत जीवन यापन करता है तो क्या व्यस्था को बदले बिना आप कोई अतिरिक्त गैर संवैधानिक शक्ति बन सकते है शायद नहीं संसद की अवमानना करके आप जंतर मंतर पर जनता की वाहवाही तो लूट सकते हैं साथ ही जनता का दर्द कुछ कम कर सकते है लेकिन दर्द से स्थाई छुटकारे के लिए आपको संसद के द्वारा ही कानून बना पायंगे तो फिर जनता के साथ छल क्यों क्या हमारे अनुभव यह नहीं कहते की विगत में बहुत से ईमान दार व्यक्तियों के द्वारा किया गया सत्ता परिवर्तन क्यों स्थाई रूप नहीं पा सका क्या वह लोग कुछ कम इमानदार थे शायद ऐसा कोई नहीं कह सकता - अब मैं आपके महत्वपूर्ण सवाल का उत्तर देने की कोशिस करता हूँ - तो फिर विकल्प क्या है मेरी छोटी बुद्धि के अनुसार विकल्प केवल एक है राष्ट्र का चरित्र निर्माण दृढ संकल्प की " न तो रिश्वत लूँगा और न ही अपना काम करवाने के लिए किसी को रिश्वत दूंगा " जिसके लिए हमारे देश में केवल एक ही व्यक्ति उपलब्ध है वो हैं श्री अन्ना हजारे जिन्होंने ने अपने जीवन काल में ही अपने छोटे से पिछड़े गाव सलेगन सिद्दी को दुनिया के नक्से पर ला कर रख दिया है लेकिन उस व्यक्ति के व्यक्तित्व को कुछ हद तक कथित सिविल सोसाइटी के सेवा निवृत असंतुष्ट ब्युक्रेट्स लोगों ने मिल कर धूमिल करने की कोशिस की और उनके कंधे पर चढ़ कर अपनी नैया पर लगाने की किसिस की है लेकिन वह शीघ्र ही उनके जाल से निकल चुके है क्योंकि इनकी दोमुही चाल उनकी समझ में जल्दी ही आ गई जो लोग संसद को समस्या बताने में गुरेज नहीं करते थे आज उसकी शरण में जायंगे अपनी सोई हुयी इच्छा पूर्ति के लिए - इस लिए भ्रष्टाचार से लड़ने का एक मात्र साधन है चरित्र निर्माण जिसको केवल अन्ना हजारे ही दिशा दे सकते है -- सिंह साहेब इसके आगे आज मेरी बुद्धि में कुछ नहीं है - इस लिए आपका धन्यवाद. कृपा दृष्टि बनाये रखे

के द्वारा:

सिंह साहब,नमस्कार! आपके दृष्टिकोण से असहमति का प्रश्न नहीं है.... मैंने भी २०१४ का भारत http://jlsingh.jagranjunction.com/2012/04/21/२०१४-का-भारत - व्यंग्य ही लिखा था, उसे भी अगर आप अवलोकन किये होंगे या करेंगे तो बहुत कुछ मेरी सोच से भी वाकिफ होंगे... सवाल यह है कि क्या देश को इसी हाल पर छोड़ दिया जाय? हमलोग या यानी बुद्धिजीवीवर्ग, मीडिया केवल आलोचना करते रहें! कुछ विकल्प तो चाहिए. या रन हो चाहे मरण होगा की ओर भी देखा जाय! अगर कल्कि अवतार या कृष्णावतार हो भी जाय तो परिणाम हम सभी जानते हैं ... क्या इस तरह के आंदोलनों का फल निकलता दीख रहा है? मेरा आग्रह होगा कि आप पुन: विचार करें! आप काफी अनुभवी और विचारशील भी हैं विकल्प क्या नजर आता है? मैंने पहले भी आपके अलेखों पर प्रतिक्रिया दी है, जिसे आप तीखा मानते होंगे. मैं या कोई भी अपना विचार ही रखता है, अपनी-अपनी समझ के अनुसार! सादर और क्षमा प्रार्थी भी अगर मुझसे कहीं ध्रिष्ठता हुई हो!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

क्या सिंह साहब, आप तिलमिलाते बहुत हैं। अब मर्दों की तरह सबके सामने बात न करके email करके मेरे नगर में आकर मेरे मन की आग बुझाने की बात करने लगे! आप जैसे सूखे कुओं में प्यास बुझाने तक को पानी नहीं होता आग क्या बुझायेंगे! फिर आपने अरविन्द केजरीवाल को मिमयाना कहा (Email के माध्यम से) । अब उनकी ओजपूर्ण आवाज में श्री वी.के.सिंह की दहाड़ भी जुड़ गयी।  1-केजरीवाल जी ने किसी को मूर्ख नही बनाया। वो अभी भी कहते हैं कि 1 साल से अधिक समय है,    यदि सरकार इस बीच Right to recall,Right to reject और जनलोकपाल कानून बना देती है तो    वह चुनाव एवं राजनीति में नहीं आयेंगे। 2- उनकी (आपकी भाषा में उसकी) बड़ी-बड़ी बातें कहीं नहीं गयी वरन् अब उससे भी बड़ी-बड़ी बात होने लगी है। 3-श्रीमन्, यदि ब्लाग लिखने का इतना शौक़ है तो आलोचना के लिये भी तैयार रहिये।    पुनः , यदि आप केजरीवाल जैसे भले मानष को "अकेले मिमयाना " कहेंगे तो आपकी बातों को भी भौंकना एवं रेकना के अलावा दूसरा सम्बोधन नहीं मिलेगा। सोनपाल सिंह(S.P.Singh) जी के निम्नलिखित email के प्रति उत्तर में .... (सादर).......... " मिस्टर मैं आपको पहले ही कह चुका हूँ कि मैं आप जैसी मानसिकता के व्यक्तित्व के मनुष्यों से दूर रहने कि कोशिस करता हूँ मेरा तुम्हारा कुछ व्यक्तिगत नहीं है मैंने जिस व्यक्ति के लिए जो कुछ कहा वह लेख के लिए आवश्यक था और उसने जो कुछ किया है वह भी जनता के सामने है उस अकेले मिमयाने वाले व्यक्ति ने पूरे देश कि जनता को मुर्ख बनने का कार्य किया है जिसकी पोल खुल चुकी है अब उसे देश के लोगों को बताना होगा कि बड़ी बड़ी बाते कहाँ गई और फिर तुम्हारे जैसे सिर फिरे अंध भक्त समर्थकों को तो संजीविनी ही मिल गई एक बार राजनीती में पैर जमने का अवसर जो भी मिल जायगा इस लिए आप न तो मुझे आइना दिखाने कि कोशिस करे न ही उत्तर देने कि अगर दिल में कुछ तमन्ना है तो मैं तुम्हारे गोरखपुर ही आ जाता हूँ अपने मन कि आग को बुझा लेना ? "

के द्वारा:

मैने श्रीमान जी को गाली नहीं दी थी किन्तु यदि आपको सत्य गाली की तरह चुभता हो मेरी क्या गलती है. बस आपने अरविन्द केजरीवाल को मिमयाना कहा तो मैने आपको प्रतिक्रिया मे भौकना और रेकना कहा. यदि आपको  भौकना और रेकना शब्द बुरा लगता हो तो दूसरों के लिये भी  मिमयाना शब्द नहीं प्रयोग करना चाहिये.  वैसे मैने जो लिखा था उसे पाठको को भी पढ़ लेने देते ,उनकी भी राय पता चलती कि मैने गाली दी थी या  आपको आइना दिखाया था. जो भी हो मेरी प्रतिक्रिया हटा कर आपने अपनी तड़प दिखा दी जो मेरा  उद्देश्य था.  (आशा है कि अब आप किसी भले मानुष के लिये उन शब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे जो भी आपको चुभते हों.)

के द्वारा:

आदरणीय योगी जी नमस्कार, आपकी सारी बातें एवं व्यथा एक दम से १०१ प्रति शत सही है जरूरत केवल धैर्य की है वह भी केवल १८ माह का २०१४ की अप्रैल मई में चुनाव ही होने है सब कुछ बदलने का समय जनता को मिलेगा लेकिन उससे पहले इतनी व्यग्रता क्यों. यह एक बहुत बड़ा प्रशन है - फिर भी किसी समस्या को देखने का सब का अपना अपना नजरिया होता है - अगर आप सविंधान से इतर किसी व्यस्था की कल्पना करते है वह आप का विवेक और टीम अन्ना का विवेक हो सकता है - मुझे ( अन्ना से नहीं ) टीम अन्ना के व्यहार से कुछ और ही लगता है जिसकी चर्चा करना मैं इस मंच पर उचित नहीं समझता - मैं आपको केवल इतना कहना चाहता हूँ. की किसी भी चलती हुई या स्थापित व्यस्था को तब तक नहीं बदला जा सकता जब तक सामने कोई विकल्प न हो इस लिए मैं इतना मान सकता हूँ की अगर टीम अन्ना किसी विकल्प की रचना करने की जुगत में व्यस्त है तो सही है - और अगर ऐसा है तो फिर वह भी जनता के साथ धोका ही होगा क्योंकि किसी राजनितिक पार्टी /दल का साथ जनता को भ्रमित करके इस लिए दिया जाय की वह सत्ता में वापस आ जाय तो फिर इतने ड्रामे की आवश्यकता क्या है सीधे सीधे ऐलान कर देना चाहिए घुमा फिर का नहीं ? वैसे अगर आपके मन में मनमोहन सिंह जी के विरुद्ध आपके पास प्रमाण है तो आप इस देश के एक नागरिक होने के नाते इतना हक़ रखते है की आप स्वयं भी उन पर मुकदमा कायम कर सकते है - जहाँ तक देश की कमान प्रधान मंत्री को सौपने की बात न तो मैंने सौंपी है और न आपने और न ही टीम अन्ना ने दी है वह भी इसी संविधान के प्रावधानों के द्वारा उनकी पार्टी ने सौंपी है जो जनता के द्वारा ही चुनी गई है और उसी संविधान ने आपको भी इस प्रकार के शब्दों को प्रयोग करने की आजादी दी है - महोदय मैं आपके इन शब्दों से सहमत नहीं हो सकता "क्यों हम एक नपुंसक को इतने विशाल देश की कमान थमाए बैठे हैं ? क्या वो इस काबिल है ? क्या उसने संसद के मानकों की रक्षा करी है ? क्या उसने संविधान की रक्षा करी है ? अगर नहीं तो सबसे बड़ा लोकतंत्र का दुश्मन तो मन मोहन सिंह हुआ ( मैं उस व्यक्ति को सम्मान नहीं दे सकता ) ? " क्योंकि अगर आप संविधान की जाँच करे तो पायंगे की संसद की अवमानना करने के बाद या संसद का विश्वाश खोने के बाद प्रधान मंत्री एक पल के लिए भी अपनी कुर्सी पर नहीं रह सकता किसी को सम्मान देना या न देना हर किसी का अपन व्यक्ति गत मामला होता है कुछ लोग तो अपने माता पिता को भी सम्मान नहीं दे सकते - मेरे लेख में मैंने अपने हेडिंग में लिखा है ""कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर न काहू से दोस्ती न कहू से बैर "" इस लिए केवल टीम अन्ना के विषय में मेरा जो विचार है वह तथ्यों पर आधारित विश्लेषण है न की समर्थन या विरोध / इस लिए आप अगर उसी परिपेक्ष्य में लेख को देखने की कृपा करे तो आपको कुछ समझ में आएगा / उदहारण का तौर पर अन्ना जब मंच से घोषणा करते है तो सयंम रखते है लेकिन बाकी टीम अलग ही राग अलापती है हो सकता हो की यह भी उनकी रणनीति का सिस्सा हो . -- आशा है आपको मेरा स्पष्टीकरण संतुष्ट करेगा -- धन्यबाद

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

श्री सिंह साब ! आपकी लिखी बातें कहीं आपको दिल से साधुवाद देती हैं और कहीं एकदम से विरोध करती हैं ! मैं किसी व्यग्तिगत आदमी की बात न करके व्यवस्था की बात कर लेता हूँ ! क्या आपको ऐसा नहीं लगता की मनमोहन जैसे व्यक्ति ने भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ अन्याय किया है ? क्या आपको ऐसा नहीं लगता की जितना मनमोहन ने इस प्रतिष्ठित पद (प्रधानमन्त्री पद ) की गरिमा को कम किया है , उसे ठेस पहुंचाई है ? क्या खुद मनमोहन पर इस देश के सर्वश्रेष्ठ संवेधानिक पद की गरिमा को कम करने का मुक़दमा नहीं चलाया जाना चाहिए ? क्या उसको खींच कर कुर्सी से नहीं उतार देना चाहिए ! क्यों हम एक नपुंसक को इतने विशाल देश की कमान थमाए बैठे हैं ? क्या वो इस काबिल है ? क्या उसने संसद के मानकों की रक्षा करी है ? क्या उसने संविधान की रक्षा करी है ? अगर नहीं तो सबसे बड़ा लोकतंत्र का दुश्मन तो मन मोहन सिंह हुआ ( मैं उस व्यक्ति को सम्मान नहीं दे सकता ) ? आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय सिंह साहब, सादर नमस्कार। अशोक जी के एक एक शब्द से मैं सहमत हूँ। आपका यह कहना कि यहाँ प्रजातंत्र है, मात्र एक भ्रम है। यह लोकतंत्र का विकृत रूप है। यह हाई कमानतंत्र है, तथा समाजवाद का विकृत रूप परिवारवाद है। जहाँ तक आजादी की बात है हम आजाद नहीं हुये थे, बल्कि समझौता हुआ था काँग्रेस और अंग्रेजों में कुछ शर्तों सहित सत्ता परिवर्तन का। सुभाष चन्द्र बोस के अपहरण के पीछे भी यह सत्ता एक कारण थी।  नेता जी चाहते थे कि जनता को सीधे आजादी न दी जाये। पहिले सैनिक शासन द्वारा उसे आजादी की कीमत समझाई जाये। क्योंकि यह आजादी बहुत कुर्बानी के बाद मिलेगी। किन्तु कुछ महात्वाकाँक्षी नेता चाहते थे कि  उन्हें सीधे शासन करने का हक प्राप्त हो जायगा। नेता जी उनके रास्ते का रोड़ा बने हुये थे। क्योंकि एक तो नेता जी के रहते अंग्रेजों से समझौता नहीं  हो सकता था क्योंकि नेता जी अंग्रेजों से समझौते के पक्ष में नहीं थे। वह तो अंग्रेजों से युद्ध करने उन्हें देश से भगाना चाहते थे। किन्तु माउन्टवेटन की पत्नि के व्यवहार के कारण कुछ नेता इसके लिये सहमत नहीं होते। दूसरी बात नेता जी के रहते कोई दूसरा व्यक्ति प्रधानमंत्री बनने की सोच भी नहीं सकता था। जो गाँधी जी को पराजित कर सकता था, उनके समाने तो अन्य नेता तो उनके आस पास भी खड़े नहीं होते थे। क्षमा चाहता हूँ चाहता हूँ भावावेश में आकर आलेख से हटकर प्रतिकिया लिख गया।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय अशोक जी, प्रणाम, सर जी मैं आपकी दोनों बातों इस समय तो सहमत नहीं हो सकता क्योंकि न तो इस देश में कभी मिलिट्री शासन हो सकता है और न ही कोई विदेशी इस देश पर शासन कर सकता है यह केवल भ्रम है ? वैसे भी लोकतंत्र की परिभाषा करने में आपक कंजूसी से काम ले रहे है क्योंकि ये लोकतंत्र की ही शक्ति है की आज लोग सड़क पर बैठ कर आन्दोलन कर रहे है और आप हम मिल कर कभी तारीफ करते है और कभी आलोचना करते है ? लेकिन समस्या से जूझने का उपाय किसी के पास नहीं है - सारी समस्यों की जड़े राज्यों में है केंद्र के मंत्री अगर भ्रष्ट है तो उन पर अंकुश लग सकता है परन्तु राज्यों में फैले भ्रष्टाचार से कैसे निबटें कौन बताएगा ? धन्यवाद.

के द्वारा:

आदरणीय सिंह साहब सादर नमस्कार, आपने काफी निष्पक्षता से अपने विचार रखे हैं. इसमें साफ़ नजर आता है की टीम अन्ना में अन्ना जी के अतिरिक्त सभी मे धैर्य की कमी है. लोकतंत्र में आन्दोलन की राह को सभी मानते हैं किन्तु आज देश में लोकतंत्र है ही नहीं पूरी तरह भ्रष्टतंत्र है. और इनसे निपटने के लिए अब किसी सैन्य क्रांति की ही जरूरत है. सरकारें बदलने से कुछ होने वाला नहीं है. किन्तु सैन्य क्रान्ति भी जोखिम से कम नहीं है.विकल्प के अभाव में भ्रष्टाचार पर और देश में इसी तरह के और भी कई आन्दोलन होंगे, अन्ना की ही तरह और भी कई नेता उभरेंगे. यह तो मात्र शुरुआत है अभी से व्यग्र होने का कोई लाभ नहीं. वह दिन भी दूर नहीं जब फिरसे हम विदेशियों के गुलाम बन जायेंगे.तब शायद सरकार में बैठे लोग अपनी गलतियों पर पछतायेंगे या जनता पछताएगी और ये चोर विदेशों में शरण ले कर मजे करेंगे. आज अन्ना के तम्बू में भीड़ नहीं है. मगर तब भले अन्ना ना हो मगर भीड़ अवश्य होगी एक और जलियांवाला काण्ड करने के लिए.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय खुराना जी सादर प्रणाम, सर यह तो कोई नपुंसक व्यक्ति भी नहीं चाहेगा की उसका भगत सिंह किसी पडोसी के यहाँ पैदा हो मेरे इस विचार से बहुत से लोग सहमत नहीं हो सकते और सवाल भी कर सकते है मेरा उत्तर केवल एक होगा वह यह कि लोक तंत्र में जनता के पास केवल अपनी समस्या आक्रोश को व्यक्त करने का एक ही रास्ता है प्रोटेस्ट/ धरना /आन्दोलन/अनशन / आमरण अनशन आदि आदि जिसके विरुद्ध सरकार भी पंगु हो जाती है लेकिन अगर हम अपने देश के भ्रष्ठाचार को समाप्त करने कि बात करें तो पायंगे कि यह इतना विकराल रूप धारण कर चूका है कि इसका निदान केवल और केवल सरकार के बस का नहीं है सरकार केवल इतना कर सकती है कि एक और कानून बना दे चाहे लोकपाल बना दे ? इस बात कि कोई गारंटी नहीं दे सकता कि भ्रष्टाचार सौ प्रतिशत समाप्त हो जायगा अन्ना ने स्वयं कहा है कि लोकपाल बनाने से ६० प्रतिशत तक भ्रष्ठाचार पर अंकुश लग सकता है तो इस का सीधा मतलब मेरे विचार से तो यही है व्यक्ति का चरित्र निर्माण की आवश्यकता है - मैंने केवल विशेलेषण ही किया है - आपकी अमूल्य टिप्पणी का आभार,

के द्वारा:

के द्वारा:

आदरणीय आस्तिक जी आपने भी केवल सिंह साहेब की टिप्पणी पढ़ कर सहमति जाता दी लेकिन यह तो मेरे साथ अन्याय ही हुआ न इस लिए आपसे अनुरोध है की मेरे लेख को एक बार अवश्य पढ़ें -सुविधा के लिए कुछ अंश यहाँ दे रहा हूँ ----"""अन्ना ने स्वयं कहा है कि लोकपाल बनाने से ६० प्रतिशत तक भ्रष्ठाचार पर अंकुश लग सकता है तो इसका मतलब साफ़ है कि ४० प्रतिशत भ्रष्ठाचार तो फिर भी बाकी रहेगा ? इस लिए मेरा यह कहना है कि भारत देश इतना बड़ा है कि जहाँ एक ओर अभी भी देश कि ६० -७० प्रतिशत आबादी रोटी कपड़ा और मकान पाने के लिए जद्दोजहद में जीवन बिता देती है दूसरी ओर ३०-४० प्रतिशत लोग देश को बाँट कर खाने में बिता रहे है उनमे से भी लोवर मिडिल क्लास अपना स्तर बढ़ाने के लिए मिडिल क्लास थोडा और पाने के लिए और अपर क्लास और अधिक सम्पनता के यत्न करता नजर आता है और उसके लिए वह इस माया जाल में भ्रमित होकर कैसा भी भ्रष्ट आचरण करने को तैयार रहता है इस लिए मेरा मानना है कि भ्रष्ठाचार एक कोढ़ के सामान सामाजिक बिमारी है ! और इसका इलाज भी समाज को ही करना होगा और इसके लिए मैं श्री श्री अन्ना हजारे कि जितनी भी प्रसंसा करू वह कम है क्योंकि महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव रालेगन सिद्दी से उन्होंने जो सफर इस उत्कर्ष कार्य को करने के लिए आरम्भ किया था आज भी उसी कार्य के आगे बढा कर पुरे भारत के समाज को ही बदलने की जरूरत है न कि इस प्रकार के राजनितिक आन्दोलन / आन्दोलन का महत्त्व अपनी जगह कायम है जो कार्य सरकार को करने है वह सरकार से कराये जायं ?इस लिए मुझे ऐसा लगता है कि श्री केजरीवाल कुछ दिग्भ्रमित से हो गए है क्योंकि अभी तो उनके public cause research foundation ने कोई रिपोर्ट प्रकाशित नहीं कि है """---- धन्यवाद.

के द्वारा:

आदरणीय सिंह साहेब हल भी सुझाया है पर आप हैं की ध्यान ही नहीं देते यह तो अन्याय है आदरणीय महोदय मैंने सुझाव भी दिया वह आपके आक्रोश में दब गया कृपया दुबारा पढ़ें ----"मेरा मानना है कि भ्रष्ठाचार एक कोढ़ के सामान सामाजिक बिमारी है ! और इसका इलाज भी समाज को ही करना होगा और इसके लिए मैं श्री श्री अन्ना हजारे कि जितनी भी प्रसंसा करू वह कम है क्योंकि महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव रालेगन सिद्दी से उन्होंने जो सफर इस उत्कर्ष कार्य को करने के लिए आरम्भ किया था आज भी उसी कार्य के आगे बढा कर पुरे भारत के समाज को ही बदलने की जरूरत है न कि इस प्रकार के राजनितिक आन्दोलन / आन्दोलन का महत्त्व अपनी जगह कायम है जो कार्य सरकार को करने है वह सरकार से कराये जायं ? " इस लिए आपके आरोप को मैं स्वीकार नहीं कर सकता, आपसे अनुरोध है एक बार फिर अवलोकन करे,धन्यवाद.

के द्वारा:

आदरनीय एस पी सिंह साहब, नमस्कार! आपने अरविन्द केजरीवाल की बघिया तो उघेड़ दी ... पर सर्वमान्य हल नहीं बताया ... अगर हमलोग इसी स्थिति में जीना चाहते हैं तो अन्ना क्या भगवन भी हमारी मदद करने से पहले कई बार सोचेंगे. आप भी मानते हैं - भ्रष्ठाचार एक कोढ़ के सामान सामाजिक बिमारी है ! और इसका इलाज भी समाज को ही करना होगा और इसके लिए मैं श्री श्री अन्ना हजारे कि जितनी भी प्रसंसा करू वह कम है - फिर आलोचना भी कड़े शब्दों में कर रहे हैं. कोई हल तो बताइए न महोदय! सभी अपना अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हैं. बाबा रामदेव भी अपने ५००० समर्थकों के साथ अपना शक्ति प्रदर्शन कर चले गए ... पर उस दिन बिलकुल ही शक्तिहीन हो गए थे, जब उन्हें महिला के वेश में भागना पड़ा था. हम सभी निष्क्रिय है. सिर्फ अपने काम से काम रखते हैं ... समय मिला तो तो थोडा अखबार, टी वी आदि देख लेते हैं या फिर कभी कभी कलम उठा लेते हैं ... और क्या करते हैं हम! देश को एक इमानदार विकल्प की जरूरत है, जो कही नहीं दीखता. मेरी इच्छा यह न थी की आपके इस आलेख पर ऐसी प्रतिक्रिया दूं पर आपने कोई हल नहीं सुझाया .... आलोचन करना सबसे आसान काम है. आदर सहित!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

जब बाजपेयी की सरकार थी तब तक नॅशनल हाइवे पर कुछ काम भी चल रहा था ...या यों कहें बाजपेयी ने नॅशनल हाइवे को बनाने में बढ़ाने में बहुत योगदान किया ..मगर पहले की कांग्रेसी सरकारों ने और बाद की कांग्रेसी सरकारों ने देश को भ्रष्टाचार के अलावा कुछ नहीं दिया... आज भी आप किसी नॅशनल हाइवे में चलेंगे तो लोग बाजपेयी को या करेंगे ... आप जिस हाइवे एन एच ५८ की बात कर रहे हैं मुझे याद है २००३ जब मैं पौड़ी ( श्रीनगर के पास ) में था तो उस सड़क पर जो शोर से काम चल रहा था... और ये काम २००५ तक काफी मंद हो गया... शायद मंद मोहन की वजह से... अभी तक इसका कुछ पता ही नहीं... लगता है ठेकेदारों ने कंग्रेस्सियों को हिस्सा नहीं पहुचाया ..... कडुवा सच यही है....

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

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प्रतिश जी,. आपका कथन -" आज सुखी वही है जो कुछ नहीं करता,जो कुछ भी करेगा, समाज उसमे दोष खोजने लगेगा उसके गुण भुला दिए जायेंगे और दोषों को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया जायेगा……प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में दोषी है दोष किसमे नहीं होते……आज यही कारण है कि हर कोई दोषी अधिक दिख रहा है गुणी या ज्ञानी किंचित ही दिखाई पड़ते हैं" ………. शायद ठीक नहीं प्रतीत होता क्योंकि अगर कोई व्यक्ति कर्म ही नहीं करेगा तो फल कहाँ से मिलेगा कर्म के अभाव में संसार ही स्थिर हो जायगा - दोष रहित कार्य करने में क्या बुराई है - इसलिए अगर कोई गुनी व्यक्ति दोष रहीं कर्म नहीं कर सकता तो उसे कर्म ही नहीं करना चाहिए ऐसा मेरा मानना है --- राम जी की भेड़ के सामान एक दुसरे की दम पकड़ कर कुएं में नहीं गिर जाना चाहिए --- धन्यवाद.;

के द्वारा:

भाई भरोदिया जी प्रणाम, आपके सवाल अपने आप में जवाब भी है - आपसे एक अनुरोध है की आप पहले मेरी पोस्ट को ध्यान पूर्वक पढ़े - फिर कमेंट्स करें तो अधिक गंभीरता आपने आप आ जायगी - जहाँ तक बात गुजरात प्रदेश के समृद्ध होने कि है गुजरात प्रदेश बहुत पहले से ही छै करोड़ गुजरातियों कि मेहनत के बल पर समृद्धि कि सीमा को तोड़ चूका था नरेन्द्र मोदी ने तो गुजरात कि समृद्धि को अपनी मार्केटिंग के लिए केवल उपयोग किया है और उसका पूरा फायदा उठाया है लेकिन फिर भी बहुत से लोगों का यह मानना है कि नरेंद्र मोदी के ही कारण गुजरात देश का एक प्रमुख राज्य बन पाया है. और मोदी ने अपने आप को गुजरात का सबसे बड़ा और लोकप्रिय ब्रांड स्थापित करने के बाद नरेंद्र मोदी अब संपूर्ण भारत के विकास और प्रगति के लिए भी उपयोगी होने के लिए संघर्षशील हैं . भले ही गुजरात में हजारों मुश्लिम नरेंद्र मोदी कि हिंदूवादी विचार धरा के कारण दंगों में अपनी जान गवां चुके हो और उनके क़त्ल के आरोप नरेन्द्र मोदी पर रहे हैं लेकिन इसके बाद उनका प्रदेश आश्चर्यजनक रूप से पूरी तरह शांत और सुरक्षित है तो क्या यह नरन्द्र मोदी का राजनितिक कौशल है या कुछ और ? वहीं दूसरी ओर मोदी का अपनी ही पार्टी में विरोध करने वाले लोगों की भी कोई कमी नहीं है. --- अगर मैंने यह सब लिखा है तो इसमें गलत क्या है - राहुल गाँधी का रोना रो कर आप बेकार के अंशू क्यों बहा रहे हो - मैं और आप उसे न तो प्रधान मंत्री बना सकते है और न बनाए जाने से रोक सकते है यह फैसला देश के जनता करेगी जिस पार्टी को बहुमत मिलेगा वह अपना प्रधान किसे चुनती है उसकी चिंता मैं क्यों करों और यह बात मैंने नरेन्द्र भाई मोदी के लिए भी कही है जरा गौर करे ---"""चूँकि यह अस्तित्व कि लड़ाई है एक और अति कट्टरवादी हिन्दुत्त्व के पक्षधर और दूसरी और धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार लेकिन इस सबका फैसला तो २०१४ के होने वाले लोकसभा के चुनाव में ही हो सकेगा इससे पहले तो दोनों ही पक्ष अपनी अपनी खेमे बंदी में सारी ताकत लगा रहे है अंतिम फैसला तो जनता ही करेगी जो सर्वोपरि है और होगा ?"""" तो मैं समझता हूँ आपका क्रोध कुछ कम हो गया होगा ? धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

सिन्ग साहब कल का बच्चा रहुल गांधी सब सिनियर को ओवर टेक करेगा तब आप की प्रतिक्रिया क्या होगी । आप बता पायेंगे की पार्टी में बडे नेता कार्यरत हो तो ईस नासमज, बिनअनुभवी को नही आना चाहिए । क्या वो नेहरु खानदान की तानाशाही नही होगी ? होगी । लेकिन आप उसे नजर अंदाज कर जाओगे । उस बात के साक्षी बनेंगे जेजे के पठक जो ईसे पढेगा । पाकिस्तान रिटर्न अडवानानी की क्या वेल्यु बची है अब । पार्टी में उन की उमर का लिहाज किया जाता है, बस । नरेंद्र मोदी को ही अब आगे आना चाहिए । आप को क्या तकलिफ है । --------भले ही गुजरात में हजारों मुश्लिम नरेंद्र मोदी कि हिंदूवादी विचार धरा के कारण दंगों में अपनी जान गवां चुके हो और उनके क़त्ल के आरोप नरेन्द्र मोदी पर रहे हैं ------ ये लाईन गुजराती मुस्लिम नही मानता । गुजरात बाहर के उन के जबरदस्ति के चाहनेवाले ही मानते हैं । गुजरात के मुस्लिम कारोबार में मानते है । वो लेन देन के नियम को जानता है । जानते हैं की लेना है तो देना पडता है और दिया तो लेना पडता है । हिदु को तकलिफ दी और वापस ले ली । हिसाब चुकता । ईस लेन-देन में दलालों को दलाली नही मिली तो गुजराती क्या करे । आसमान सर पे उठा लिया । अब अपने राज्यों की प्रजा से गुजरात की दलाली वसुल कर रहे हैं वोट के रूप में ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय अनुराधा जी यूँ तो अपने किसी लेख के लिए मैं किसी को जवाब देने के लिए बाध्य नहीं हूँ परन्तु जब आपने मेरा नाम लिख का मुझे खुला पात्र ही लिख दिया है तो उसका जवाब देना भी जरूरी ही हो गया है, पहली बात तो यह है की मैंने जिस बात को कहा ही नहीं है उसे आप बल पूर्वक मेरे मुहं में ठूसना चाहती है जो की गलत है, दूसरा यह की मैं अपने लेख के पहले वाक्य में ही लिखा है की यह जागरण मंच के द्वारा बहस आरम्भ की गई है आपको कोई आपत्ति है तो मंच से कहें - क्या आप को इस कारण से दुःख है की जागरण अखबार ने लेख के कुछ अंश प्रकाशित कर दिया है - वैसे भी सच्चाई से आँखे बंद करने वाले को तो कोई कुछ समझा ही नहीं सकता - आदरणीया अनुराधा चैधरी जी, मुझे यह समझ में नहीं आया की आपका आक्रोश मुझ पर है यह मेरे लेख पर है या जागरण मंच पर है अगर आपकी नजर में अखबार वाले गलत है मेरे लेख के कुछ अंश छाप कर तो आप अख्बार वालो से शिकायत करे मुझ से क्यों ? दूसरी बात आपने मेरा लेख पुरे ध्यान से पढ़ा ही नहीं है मैंने लेख में कहनी भी गोधरा काण्ड या गोधरा का नाम नहीं लिया है लेकिन फिर भी उन शब्दों को मेरे मुंह में ठुसने की कोशिस की है ? मेरठ के विषय में आपको एक बात बताना चाहूँगा की मेरा जन्म ही मेरठ की क्रन्तिकारी भूमि पर ही हुआ है और यही भूमि मेरी कर्म भूमि भी है जहाँ मैंने ४० वर्ष सरकारी सेवा की अब ७ वर्ष पूर्व अवकाश ग्रहण कर चूका हूँ. मेरठ के दंगे आपने अख़बारों में पढ़े और देखे होंगे मैंने प्रत्यक्ष देखें है – और हाँ विद्वान जन अपने को ज्ञानी और दुसरे को मुर्ख नहीं समझते है —- वैसे तो आपके कमेंट्स का जवाब में अपने ब्लॉग पर ही दे चूका हूँ परन्तु आपने ब्लॉग के रूप में व्यक्तित्व पर ही आक्रमण किया है तो इसका जवाब भी देना ही पड़ेगा - दूसरी बात आपने ८४ के सिक्खों के संहार की बात की है तो मेराआपसे अनुरोध है की ऐसे विषय को अगर न उठाया जय तो उचित ही होगा क्योंकि उस समय के पंजाब के उग्रवाद के कारण ही पवित्र स्थल पर जो फ़ौज की कार्यवाही हुयी थी उसी की परिणिति में इंदिरागांधी के सुरक्षा कर्मियों ने ही उनकी ह्त्या कर दी थी जिस कारण पुरे देश में सिक्खों का कत्ले आम हुआ था और उस समय के फौजी जनरल वैध की भी ह्त्या की गई थी वह उग्रवाद एक त्रासदी थी उसको वही जान सकता है जिसने उसे झेला था और आज भी झेल रहे है ? क्योंकि निर्दोष लोगों की हत्या और सांप्रदायिक दंगे किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक होते है इस लिए उसकी भर्त्सना की जाती है उसे किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता और न ही मैंने किसी दंगे को उचित नहीं ठहराया है इस लिए आपके सारे आरोप निराधार है . > किसी ब्लॉग पोस्ट पर टिप्पणी उसी पोस्ट पर की जाय तो उचित है और वही आपने किया भी लेकिन आपने पता नहीं किस विच्छोब या दुर्भावना या जलन के कारण मेरे विरुद्ध एक अभियान का आरम्भ ही कर दिया है आपसे पहले यह कार्य कई सज्जन पुरुष कर चुके है लेकिन आज एक स्त्री को मैदान में उतार दिया है हो सकता है उन्ही में किसी ने छद्दम नाम से ऐसा लेख लिख कर मेरे विरुद्ध एक युद्ध जैसा छेड़ दिया है, चूँकि आप एक स्त्री है और किसी स्त्री का ऐसा आचरण हो ही नहीं सकता इस लिए आपसे अनुरोध है की भविष्य में इस प्रकार निंदक कुप्रचार और व्यक्तिगत द्वेष या दुर्भावना से मेरे विरुद्ध कोई प्रयास न करे अन्यथा व्यक्तिगत स्तर पर लिखना मुझे भी आता है और एक सम्मानित स्त्री होने के नाते आपको अधिक तकलीफ और छोभ होगा, इस लिए आशा है आपको कुछ अनुभूति अवश्य ही होगी, धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

भाई पवार जी, नरेन्द्र मोदी पर अपने विचार जागरण जंक्शन पर प्रचारित जागरण ब्लॉग “नरेन्द्र मोदी भाजपा के भावी उद्धारक या एक ताना शाह व्यक्त्तित्व /” की प्रतिक्रिया में ही बिंदु वार लिखे है. विषय जागरण का मेरा नहीं, मैंने केवल विश्लेषण ही किया है अगर उस पर आपको आपति है तो यह गलत है - कृपया इन शब्दों पर ध्यान दीजिये----" जहां तक बात गुजरात प्रदेश के समृद्ध होने कि है गुजरात प्रदेश बहुत पहले से ही छै करोड़ गुजरातियों कि मेहनत के बल पर समृद्धि कि सीमा को तोड़ चूका था नरेन्द्र मोदी ने तो गुजरात कि समृद्धि को अपनी मार्केटिंग के लिए केवल उपयोग किया है और उसका पूरा फायदा उठाया है लेकिन फिर भी बहुत से लोगों का यह मानना है कि नरेंद्र मोदी के ही कारण गुजरात देश का एक प्रमुख राज्य बन पाया है. और मोदी ने अपने आप को गुजरात का सबसे बड़ा और लोकप्रिय ब्रांड स्थापित करने के बाद नरेंद्र मोदी अब संपूर्ण भारत के विकास और प्रगति के लिए भी उपयोगी होने के लिए संघर्षशील हैं . भले ही गुजरात में हजारों मुश्लिम नरेंद्र मोदी कि हिंदूवादी विचार धरा के कारण दंगों में अपनी जान गवां चुके हो और उनके क़त्ल के आरोप नरेन्द्र मोदी पर रहे हैं लेकिन इसके बाद उनका प्रदेश आश्चर्यजनक रूप से पूरी तरह शांत और सुरक्षित है तो क्या यह नरन्द्र मोदी का राजनितिक कौशल है या कुछ और ? वहीं दूसरी ओर मोदी का अपनी ही पार्टी में विरोध करने वाले लोगों की भी कोई कमी नहीं है. इनका कहना है कि नरेंद्र मोदी एक अहंकारी और तानाशाह किस्म के व्यक्ति हैं. वह अपने अलावा किसी को कुछ नहीं समझते. हर हाल में अपनी जिद मनवाने वाले नरेंद्र मोदी खुद को भाजपा हाईकमान के रूप में प्रचारित करने लगे हैं, जबकि आज भी भाजपा में आडवाणी जैसे कई वरिष्ठ और अनुभवी नेता मौजूद और सक्रिय हैं. भाजपा के इतिहास में किसी ने पार्टी की नीतियों और आदर्शों का उल्लंघन नहीं किया लेकिन वह एक अपवाद के रूप में अपनी पहचान बनाने पर तुले हुए हैं. पार्टी में भले ही उनका रुतबा बढ़ गया हो लेकिन सवाल यह है कि क्या हमें ऐसा ही कट्टर हिंदूवादी प्रधानमंत्री चाहिए जो पार्टी के साथ-साथ देश को भी अपने अनुसार ही चलाना चाहे. शायद जनता का उत्तर न में होगा ? इस कथन को मैंने केवल उधृत किया है अगर फिर भी मेरे लेख से आपको तकलीफ होती है तो यह इस लेख की सफलता ही हो सकती है अन्यथा मैंने किसी को बदनाम नहीं किया है केवल वाही कहा है जो तथ्य जनता के बीच में है, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

सोहनपाल जी आपने जिस कट्टर हिंदूवादी की बात कही कि वह प्रधानमंत्री नहीं हो सकता क्या आप बता सकता है कि क्यूँ नरेन्द्र मोदी जी कट्टर हिंदूवादी है ? गुजरात दंगे ? लेकिन क्या सच में नरेन्द्र मोदी उसके दोषी है ? जब उन्हें कोर्ट से और सीबीआई से बरी किया जा चूका है तो समझ में नहीं आता कि कुछ लोग सस्ती लोकप्रियता के लिए आज भी एक ही जिद पर अड़े बैठे है ! अटल जी ने अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभाई और शायद और भी अच्चा कर सकते थे अगर गठ्बंदन कि सर्कार न होती वो भी २३ दलो से बनी हुई ! लेकिन कांग्रेस के पास एक अच्चा मौका था देश के लिए कुछ करने का पर देश को गर्त मई ही दखेला ! आपका लेख पढ़कर एक ही बात समझ में आई कि प्रधान मंत्री बन्ने के लिए एक मात्र योग्यता ये हो कि वो हिंदुत्व मई विश्वाश न रखता हो चाहे वो कितना भी भ्रष्ट और स्वार्थी हो ! यहाँ तक कि कोई नॉन-हिन्दू जिहादी ही क्यूँ न हो ! भारतीय साम्प्रदायिकता शायद अलग तरह से प्रभाषित है ! अगर कोई निर्मम गोकशी के खिलाफ आवाज़ उठाये तो वो सांप्रदायिक है ! भारी भरकम हज़ सब्सिडी जिसको सुप्रेमे कोर्ट ने गलत माना है,उसका विरोध जो लोग अब तक करते आये थे वो भी सांप्रदायिक है ! इस्लामी जिहादी ताकत से प्रभावित कुछ लोग दुनिया भर का सुकून उडाये हुए है तो वो उनका हक है और अगर कोई रामदेव या अन्ना हजारे के आन्दोलन में शामिल होता है तो उससे या तो भाजपा या फिर RSS का अगेंट कहा जाता है और भगवा आंतंकवादी कहा जाता है ! वैसे तो सबका धर्म मानवता का फिर भी अगर कोई हिंदुत्व में विश्वास रखता है तो कौन सा बड़ा पाप हो गया ! हिन्दू धर्म तो अपने आप में इतना विशाल है ये सभी धर्मो का आदर करने कि सीख देता है ! दया और प्रेम के सागर को नया रूप देता है ! जो हालत आज बारात कि है शायद ही आज से पहले वो हुई है ! मनमोहन सिंह तो इतिहास में ध्रतराष्ट्र के रूम में दर्ज हो चुके है अब देखना ये कि उनका मौन वर्त कब टूट ता है ! वैसे एक जिम्मेदारी उन्हें खूब याद रही जो काबिल-ऐ तारीफ है वो है आधी रात को भी हाथ मुह धोकर राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री कि जिम्मेदारी सौंपकर तीर्थ यात्रा पर निकल जाना ! शायद वो भी अब परेहन हो गये है रोबोट का रोले निभाते हुए ! इंदिरा गाँधी और अटल जी को देश का बच्चा बच्चा जानता है लेकिन हमारे मनमोहन सिंह जी को लेकर तोह कई बार कुछ लोग इस दुविधा में पड़ जाते है कि प्रधानमंत्री वही है या सोनिया जी? देवबंद के दारुल उलूम ने फतवा जारी किया ki हिन्दुस्तानी मुस्लमान पहले मुस्लमान है बाद में हिन्दुस्तानी तो जनाब दिग्विजय सिंह ने उनके धार्मिक होने कि तारीफ कि और मनमोहन और कपिल सिबल जी तो इतने खुश हुए कि सभी मदरसों पर भरी खर्च करने के लिए बुद्गेत में अलग से परस्ताव ही दे डाला ! मुस्लिम भाइयो को वोट बैंक कहते है राजनीतिज्ञ ! इसीलिए अफज़ल गुरु और अजमल कसाब हमारे देश के राष्ट्रीय अतिथि है और उनकी सुविधा का पूरा इंतज़ाम है ! भले ही अपने नागरिक भूक और बेकारी से मरते रहे लेकिन कसाब के ऊपर कि जाने वाले खर्च पर एक रूपया भी कम हुआ तो भारत को कट्टर हिंदूवादी बना दिया जाएगा ! इससे बड़ा अपमान मुसलमानों का नहीं हो सकता कि उन्हें भेड़ो के समूह कि तरह इस्तेमाल किया जाता है ! क्या हर मुस्लमान कि कोई अपनइ निजी सोच नहीं ? आपको शायद लगे कि में विषय से भटक रहा हु लेकिन नहीं , ये सब आपस में ताल्लुक रखते है ! नितीश कुमार जी ने नरेन्द्र मोदी का विरोध सिर्फ इसलिए किया कि शायद वो भी बिहार के मुसलमानों को वोट बैंक ही समजते है !                             खैर सोहनपाल जी आपके ब्लॉग में आपके अपने विचार है लेकिन इस देश का अगर कुछ भला हो सकता है तो वो नरेन्द्र मोदी जी के बिना तोह शायद नहीं ! वो ऐसे व्यक्ति है जिनको कोई फरक नहीं पड़ता कि भाजपा में या कही और ! जबरदस्त इच्छाशक्ति और कमाल का नेतृत्व तथा निर्णय लेने कि गज़ब कि हिम्मत , इन सब कि जरूरत है भारत को ! जो लोग उनको बदनाम करने में लगे वो महज़ सस्ती लोकप्रियता के पीछे है !

के द्वारा:

 आदरणीया अनुराधा चैधरी जी, मुझे यह समझ में नहीं आया की आपका आक्रोश मुझ पर है यह मेरे लेख पर है या जागरण मंच पर है अगर आपकी नजर में अखबार वाले गलत है मेरे लेख के कुछ अंश छाप कर तो आप अख्बार वालो से शिकायत करे मुझ से क्यों ? दूसरी बात आपने मेरा लेख पुरे ध्यान से पढ़ा ही नहीं है मैंने लेख में कहनी भी गोधरा काण्ड या गोधरा का नाम नहीं लिया है लेकिन फिर भी उन शब्दों को मेरे मुंह में ठुसने की कोशिस की है ? मेरठ के विषय में आपको एक बात बताना चाहूँगा की मेरा जन्म ही मेरठ की क्रन्तिकारी भूमि पर ही हुआ है और यही भूमि मेरी कर्म भूमि भी है जहाँ मैंने ४० वर्ष सरकारी सेवा की अब ७ वर्ष पूर्व अवकाश ग्रहण कर चूका हूँ. मेरठ के दंगे आपने अख़बारों में पढ़े और देखे होंगे मैंने प्रत्यक्ष देखें है - और हाँ विद्वान जन अपने को ग्यानी और दुसरे को मुर्ख नहीं समझते है ---- कमेंट्स के लिए धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

आदरणीय सिंह साहब आपका लेख जिसको दैनिक जागरण ने अपने अखबार मे छापा है के लिये बधाई। आपका लेख पढ कर एक बात समझ मे आई कि अखबार वाले सही और गलत के आकलन के लिये न जाने कैसे कैसे मानक तय करते है । एक सामान्य स्तैरीय लेख को महत्वसपूर्ण् बना दिया। खैर बात लेख की करूगी। आपने अपने लेख मे कहा कि नरेन्द्र मोदी एक कटटर हिन्दू वादी नेता है। मोदी गोधरा काण्ड के सूत्रधार है। सिंह साहब आप बतायें कि गोधरा काण्डह है क्याक। यदि आपको ध्यारन होगा तो आप जानते होगे कि गोधरा मे साबरमती एक्सदप्रेस से अयोध्याप से वापस आ रहे कारसेवको को गाडी के डिब्बेक मे पेटोल डाल कर जला दिया गया था। क्याे नरेन्द्रब मोदी ने अपने लोगों को भेजकर अपने ही कारसेवको को जलवा दिया था। यदि नही तो इसके लिये नरेन्द्रव मोदी कैसे जिम्मेीदार है। दूसरी बात गोधरा काण्डह के बाद गुजरात मे दंगे हुए। उन दंगों के लिये नरेन्द्रै भाई को जिममेदार माना जाता है। यह सही है कि नरेन्द्र् मोदी उस समय गुजरात के मुख्या मत्री थे। उनके मुख्य मत्रित्वर काल मे दंगे हुए लेकिन आप गौर करे तो भारत वर्ष मे देश की आजादी के बाद से गुजरात दंगो के पहले भी कई भीष्णक दंगे हुण्‍। 1987 मे मेरठ का मलियाना दंगा कई दिनो तक चला। बहुत छोटी घटना पर दंगा हुआ। इस घटना की निखिल चक्रवर्ती ने तुलना हिटलर की बरबरता से की थी। कुलदीप नैय ने इसकी तुलना नैली से की थी रजनी कोठारी ने इसे इथनोसाइड का नाम दिया था। एम जे अकबर ने इस घटना मे पी0ए0 सी0 भूमिका के बारे मे कहा कि पी0ए0सी0 का व्य।वहार फासीवादी था। यह घटना न तो नरेन्द्र मोदी के समय हुई और न ही केन्द्रन मे भारतीय लनजा पार्टी की सरकार थी। जिस समय यह घटना हुई उस समय केन्द्र और राज्य दोनो मे कांग्रेस की सरकार थी। तो क्या कांग्रेस सरकार दोषी नही थी। उसे कोई क्यों नही फासीवादी कह जाता। 1984 मे इन्दिरा गांधी जी की हत्याग हुई उस समय पूरे देश मे शिखों के विरूद्ध हुए दंगे गुजरात से ज्याेदा भीष्ण। थें। उस पर कोई क्यों नही आंसू बहाता वे लोग भी तो अल्प संख्याक है। उस घटना पर आसू बहाने वाला कोई नही है क्यो्कि सिखों की संख्याा इतनी कम है कि वे राजनीति मे किसी निर्णायक भूमिका मे नही हैं दूसरी बात कि सिख समाज का एक हिस्सा भारतीय जनता पार्टी के साथ है। इसलिये 1984 के दंगे को सब भूल गये। एक महत्वथपूर्ण बात और है अधिकांश समय केन्द्र मे कांग्रेस की सरकार रही और वह गुजरात के मुददे को जिन्दा रखना चाह रही थी इसलिये मिडिया के माध्य म से मुददे को जीवित रखा गया। आज नरेन्द्रि भाई मोदी को गुजरात की जनता अपना मुख्ययमंत्री बनाये हुए है उसे कोई कष्टो नही है लेकिन गुजरात के बाहर धर्म निरपेक्षता के झण्डाईबरदार उसे जीवित किये हुए हैं। रही बात उनके अहंकारी होने का तो आप ही बतायें उनमे अहंकार कहां लगा। संजय जोशी जी जो संघ से वी0जे0पी0 मे आये थे पुन: संघ मे चले गये। इस प्रकार कई लोग आवश्यनकतानुसार संघ से वी0जे0पी0 मे आते है और काम खत्मध होने पर पुन: संध मे चले जाते है। यह संघ और वी0जे0पी0 का आन्तथरिक मामला है इससे किसी के पेट मे दर्द क्योंघ होता है। कांग्रेस का कामराज प्लाकन क्या था। अब आप कहेगे कि मेरे कहने का मतलब संध और वी0जे0पी0 का वही सम्ब न्ध0 है जो कांग्रेस के संगठन और सरकार का तो यह सही है। वी0जे0पी0 और स्व्यं सेवक संघ एक दूसरे के पूरक है। संघ पंथ निरपेक्षता आदि के वारे मे अगर जानना हो तो श्री हदय नरायन दीक्षित जी का दिनांक 29 जून 2012 को दैनिक जागरण मे छपे लेख को पढें। एक बात और दिनांक 28 जून 2012 को टी0वी0 चैनल न्यूूज 24 पर एक खबर चल रही थी जिसे खुलासा किया गया कि आतंकी अबू हमजा ने बताया है कि लश्क र आतंकवादियों के प्रशिक्षण कैम्पोंक मे गुजरात दंगो का उल्लेखख करके उन्हे भारत राष्टो कि विरूद्ध जेहाद के लिये तैयार किया जाता है। हमारे राजनेता गुजरात दंगो का प्रयोग कर अपनी राजनीति कर रहे है और लश्कतर अपने जेहादी तैयार कर रहा है अब आप ही बतायें कि लश्क‍र और हमारे राजनेताओं की क्याज फर्क है। यह सभी मानते है कि नरेन्द्र भाई मोदी ने गुजरात को एक विकसित राज्य बनाया। कांग्रेस जो धर्मनिरपेक्षता की झण्डाकबरदार है ने देश को भ्रष्टासचार और अराजकता के गर्त मे ढकेला। आज जब अन्नार हाजरे जी भ्रष्टाटचार के विरूद्ध अभियान चलाते है तो सभी उनके साथ खडे हो जाते हैं। लेकिन नरेन्द्रभ मोदी के उपर भ्रष्टाीचार का आरोप न लगा पाने वाली टीम के अरविन्द केजरीवाल भी नरेन्द्रन मोछी के विरूद्ध प्रचार करने गुजरात जाने वाले है। अजीब हिप्पोेक्रेसी है। लोगों मे नरेन्द्र भाई मोदी का विरोध करने का एक चलन बन गया है। जैसे वी0जे0पी0 का विरोध करना धर्म निरपेक्षता का प्रमाण पत्र माना जाता है। विराध क्योी किया जा रहा है मालूम ही नही है। अरविन्दज केजरीवाल ने क्याक अब भ्रष्टाैचार छोडकर धर्मनिरपेक्षता की लडाई शुरू कर दी है। कांग्रेस को अपने रणनीति पर पुर्नविचार करना चाहिए। गुजरात मे मोदी विरोध के वावजूद दो चुनाव जीत नही मिल सकी अब तो अपनी रणनीति पर पुर्नविचार करे। यू0पी0 के चुनाव मे अत्यधिक मुस्लिम तुष्टीककरण के वावजूद पार्टी को कोई महत्वीपूर्ण सफलता नही मिली। सिंह साहब क्याट आप जानते है कि काफी लम्बे समय से देश मे कोई साम्प्र्दायिक दंगा क्यो न ही हुआ। इसके लिये कोई राजनेता जिम्मेमदार नही है बल्कि समाज की बदलती सोच जिम्मेकदार है। दोनो वर्गो के लोग अब अपनी रोजी रोटी की बात करते है उन्हे‍ अपनी जिविका कमाने से ही छुटटी नही है दंगे फसाद के बारे मे कौन सोचे। ये राजनेता अगर हमे याद न दिलाये तो शायद हम सब कुछ पुरानी बाते भूलकर नया अध्या य शुरू कर दे लेकिन ये लोग हमे जीने नही देगे। शायद आपको मै याद न दिलाती तो आप मलियाना काण्डे भूल गये होते। जिस प्रकार आप मिलयाना काण्डि भूल गये क्याद उसी प्रकार गोधरा और गुजरात काण्डप नही भूल सकते। अन्तभ मे एक बात और कहना चाहूगी। अगर नरेन्द्र भाई मोदी जानबूझ कर गुजरात दंगा कराये होते तो उस घटना के बाद गुजरात मे और दंगे होने चाहिए थे। गुजरात दंगा गोधरा काण्डो की स्वुत: परिणति थी जिसे दु:श्व प्नड मानकर भूलना बेहतर है नही तो हम देश मे ही लश्कदर का उददेश्यि पूरा करने मे सहयोग करेगें।

के द्वारा:

आदरणीय बन्धुओ मैं आपकी सभी बातों का समर्थक हूँ लेकिन मैं अपनी बात की हिन्दू उदार वादी है और कालान्तर में भी रहेगा इसमें कोई गलती नहीं समझता कारण भी स्पस्ट है कि हम चरों ओर से धर्म के कवच से बंधे हुए है इसलिए हिन्दू कभी आक्रमणकारी रहा ही नहीं है हिन्दू संस्कृति में ही नहीं है और हिन्दू उदारवादी नहीं होता तो हम कभी भी गुलाम नहीं बन सकते थे ऐसा मेरा विश्वाश है - मैं किसी भी आरक्षण के खिलाफ हूँ वर्तमान में जो भी आरक्षण है वह भी गलत तरीके से दिया जाता है जिस कारण से लाखों करोड़ों. स्वर्ण जाति के लोग इस निति के कारण अपनी पहचान खोते जा रहे है और संभव है कालांतर में वे ही आरक्ष कि मांग करेंगे या !!!!!!! मेरा ऐसा भी विश्वाश है कि हर काली रात के बाद सुबह का नया सूरज निकलता है - और जब तक इसी संविधान के अंतर्गत चुनाव होंगे तो सरकारे भी बदलेगीं और उन्हें अपने किये कि सजा भी मिलेगी. धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

इसमें संदेह नहीं की अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा, वह जनता ही तय करेगी आज तक ऐसा जनता ही करती आई है क्यूंकि अपने देश में लोकतंत्र जिन्दा है और चुनाव दर चुनाव अपना लोकतंत्र परिपक्व और मजबूत होता जा रहा है लेकिन मैं आपकी एक बात नहीं समझ पाया एक तरफ तो आप हिन्दू को उदारवादी और सभी धर्मो का जन्मदाता कहते हैं और हिंदुत्व की बात करने से परहेज करते हैं आज अपने देश के नेता कुछ और नहीं कर रहें हैं सिवाय "फूट डालो राज करो " यही कर रहे हैं और यह उसीकी देन है की मुस्लिमो को आरक्छन देने की हिमायती की गयी पिछले विधान सभा चुनाव के दौरान नेताओं की राजनितिक चाल से जनता भी अब परिचित हो चुकी है और यूपी के चुनाव परिणाम इसका गवाह है हलाकि समाजवादी पार्टी भी कोई बहुत जनहित चाहने वाली पार्टी नहीं पर चूँकि सत्ता में काबिज कांग्रेस से इस देश की जनता इतनी त्रस्त हो गयी है की उसने मुलायम को कांग्रेस से बेहतर समझा और यह बेहद अफ़सोस की बात है की आज दोनों राष्ट्रिय पार्टियाँ अपना जनाधार खोती जा रही हैं इन सबका मुख्य कारन इन पार्टियों का जनता की तकलीफों से अनजान बने रहना ही कहा जायेगा आज कितने ही अनुतरीत प्रश्न है बढती महंगाई ,भ्रष्टाचार ,कालाधन , नित नए घोटाले, और अपराधियों का बेखौन्फ़ बने रहना . न्याय प्रणाली में असीमित देरी दोषियों को सजा दिलाने के बजाय उनका सर्कार में समर्थन लेना यही सब गठबंधन सर्कार की देन है और आनेवाला लोकसभा चुनाव भी कुछ ऐसा ही परिणाम लायेगा और मेरी राय में छेत्रिय पार्टियाँ राज्यवार बहुमत में होंगी. और दोनों राष्ट्रिय पार्टियाँ हासिये पर होंगी और फिर कितनी पार्टियों का गठबंधन बनेगा आज कहना मुश्कील है और उस समय प्रधानमंत्री किसको बनाया जाये यह निश्चीत करना भी एक टेढ़ा काम होगा न इनमे सहमती बनेगी, किसी एक नेता के प्रति न यह तय किया जा पायेगा किसको पी एम् बनाया जाये हाँ अगर देश चार पांच प्रधान मंत्री कबूल कर पायेगा तो शायद उतने पी एम् पद के दावेदार जरुर दिखलाई देंगे जैसा आज भी है , अंत में अपने विचार लिखने के लिए धन्यवाद

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

आदरणीय अशोक जी आपसे क्षमा सहित आपकी टिप्पणी पर एक जवाब देना चाहूँगा, कि आपका कथन ---- "हिन्दुस्तान में क्यों हिंदुत्व की बात करना अपराध है? क्यों " इस विषय में मेरा यह मानना है कि हिन्दुस्तान, और हिन्दू का हृदय इतना बड़ा और उदार है कि इसमें पूरा संसार ही समा जाय तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा जैसे आज के अनेकों धर्म जो हिन्दुस्थान से ही पैदा हुए है दुनिया में फल फूल रहे है हर हिन्दू का हृदय बहुत बड़ा है जहाँ मेहमान को भी भगवान्/देव कि संज्ञा से संबोधित करने का प्रचलन है इस लिए मेरे विचार से किसी भी हिन्दू को अपनी बड़ाई स्वयं करने में या हिंदुत्व का ठेकेदार कहना उचित नहीं होगा क्योंकि इस विषय में एक कवी ने कहा है " बड़े बड़ाई न करे बड़े ना बोले बोल ! -- रहिमन हीरा न कहे लाख टका मेरो मोल !! इस लिए हिंदुत्व के नाम पर हिंसा और बादअमनी फैलाना कहाँ तक उचित होगा इस लिए भारत में जो भी व्यक्ति केवल भारतीयता कि बात को महत्त्व देगा वही राज करेगा ? धन्यवाद.

के द्वारा:

आदरणीय श्री खुराना जी, सादर प्रणाम, यह अस्तित्व कि लड़ाई है एक और अति कट्टरवादी हिन्दुत्त्व के पक्षधर और दूसरी और धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार लेकिन इस सबका फैसला तो २०१४ के होने वाले लोकसभा के चुनाव में ही हो सकेगा इससे पहले तो दोनों ही पक्ष अपनी अपनी खेमे बंदी में सारी ताकत लगा रहे है अंतिम फैसला तो जनता ही करेगी जो सर्वोपरि है और होगा ? लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है की हमारे संविधान निर्माताओं ने शायद कभी यह कल्पना भी नहीं की होगी की भविष्य में आजके जैसी वर्तमान राजनितिक बिरादरी शासन करेगी,साथ ही आज परिवातना की बात करने वाले कठिन समाज सेवियों के पास कोई विजन नहीं है उनका जोर केवल उत्तर भारत पर ही अत अगर उनके प्रयास से शासन में बदलाव भी हुआ तो वह अधुरा ही होगा, चूँकि इन लोगों का अजेंडा भी राजनितिक ही है इस लिए आप की बात सही है--"की राजनीती बहुत गन्दी हो चुकी है" धन्यव्व्द.

के द्वारा:

सिंह साहब , नरेंदर मोदी धर्मनिरपेक्ष छवि बनाने में असफल हुए है ,दुसरे शब्दों में कह सकते उनके प्रयास इस मिथ को और तोड़ते से प्रतीत होते है , मै इसके लिए वंहा के दंगो , SIT की रिपोर्ट ,राहुल भट्ट के वक्तव्य ,और जाकिया जाफरी के हलफनामे यह साड़ी बात कह रहे है समय समय पर सार्वजानिक मंचो पर उनके मुस्लिम विरोधी तहरीरे की तरफ ध्यान ले जाना चाहूंगा , उस दृश्य की तरफ आपका ध्यान खीचना चाहूँगा ,जब सद्भावना दिवस पर इक मुस्लिम इमाम की सद्भावना टोपी को उन्होंने अपने सर पर पहनने से इनकार कर दिया , देश को ऐसे नेता की जरुरत है ,जो सारे वर्णों ,धर्मो ,जातिओं को इकरूप में देखे , आपक एक बेहतरीन विचारधारा रखते है ! आपके विचारों से शब्दश सहमत हूँ !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

के द्वारा: अजय कुमार झा अजय कुमार झा

आदरणीय श्री अशोक जी एवं श्री दिनेश आस्तिक जी आप दोनों का हार्दिक प्रणाम, आप दोनों महानुभावों की टिप्पणी अपने स्थान पर सही और उचित है, लेख में मैंने अपनी और से कोई आरोप नहीं लगाया है मैंने केवल जागरण फोरम द्वारा प्रचारित विषय “Jagran Junction Forum” “नरेन्द्र मोदी भाजपा के भावी उद्धारक या एक ताना शाह व्यक्त्तित्व /” पर ही लेख लिखा है, वैसे भी राजनितिक व्यक्ति पर राजनितिक द्वेष और प्र्तिद्विन्दिता के आरोप ही लगते है और उसका जवाब भी राजनितिक ही होता है क्योंकि आरोपों और प्रत्यारोपण के ही कारण चुनाव में हार जीत होती है उसी हालात को दृष्टि में रखते हुए ही मेरा लेख है अन्यथा न तो मुझे नरेन्द्र मोदी से कोई लाभ हनी है न ही भारतीय जनता पार्टी से कोई दुराव है क्योंकि मैंने लेख का समापन ही एक लाइन में किया है --"चूँकि यह अस्तित्व कि लड़ाई है एक और अति कट्टरवादी हिन्दुत्त्व के पक्षधर और दूसरी और धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार लेकिन इस सबका फैसला तो २०१४ के होने वाले लोकसभा के चुनाव में ही हो सकेगा इससे पहले तो दोनों ही पक्ष अपनी अपनी खेमे बंदी में सारी ताकत लगा रहे है अंतिम फैसला तो जनता ही करेगी जो सर्वोपरि है और होगा ? " प्रतिक्रिया के लिए आप दोनों का धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

आदरणीय सिंह साहब सादर नमस्कार,"अंतिम फैसला तो जनता ही करेगी जो सर्वोपरि है और होगा ?" यही अंतिम सत्य है. गोधरा काण्ड को भूलकर बार बार गुजरात में मुस्लिमो पर हुए जुल्म के लिए मोदी को ही दोषी ठहराना कहाँ तक जायज है मै कभी समझ नहीं सका क्योंकि जन भावना क्या मोदी ने पैदा की थी? इंदिरा जी की मौत पर सिख समुदाय को दोषी ठहराना जायज था क्यों उसमे राजीव गांधी दोषी नहीं थे? क्यों पूरी धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस उसमे दोषी नहीं थी? सिर्फ एक प्रदेश नहीं पुरे देश की त्रासदी थी यह. हिन्दुस्तान में क्यों हिंदुत्व की बात करना अपराध है? क्यों मुस्लिम हितों की बात करना धर्मनिरपेक्षता है? क्यों सम्रद्ध प्रदेश का मुख्यमंत्री ही विकासशील नजर आता है? पूरी तरह बिखरी हुई पार्टी बीजेपी में क्या एक नाम से कोई जोश आ जाएगा? पार्टी के बड़े बड़े नामो को दरकिनार कर एक कट्टरवादी नाम को बढ़ावा देकर पार्टी अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मार रही? मोदी का नाम आते है जेहन में कई सवाल खड़े हो जाते हैं, अच्छा होगा की बीजेपी यदि इस नाम पर सहमति बनाने की कोशिश कर रही हो तो पुनर्विचार जरुर करे.

के द्वारा: akraktale akraktale

श्री सिंह साब , नमस्कार ! आप बहुत ही तथ्यपरक और सटीक लेख देते हैं ! दीदी क्या कर सकती हैं , और क्या करना चाहती हैं ये अब बहस का मुद्दा नहीं रहा क्योंकि कांग्रेस नीट सरकार के पास सी . बी . आई . नाम का एक ब्रह्माश्त्र है जिससे वो जिसको चाहे उसको अपने वश में कर सकती है ! ज्यादा कहने ठीक नहीं होगा किन्तु इतना तो आप भी जानते ही हैं की कांग्रेस जिस समाजवादी पार्टी के समर्थन से फूल रही है उसके नेता मुलायम सिंह को कब्ज़े में करना बड़ा आसान है ! मुलायम को बस ब्रह्मा अष्ट्र का भय दिखा दिया और मुलायम सिंह ने दौड़ लगा दी जनपथ की तरफ ! दीदी की तारीफ करनी चाहिए की उसने एक "भ्रम " के बने हुए किले को हिलाकर रख दिया और सोनिया को उसकी औकात भी दिखा दी ! राष्ट्रपति कोई भी बने लेकिन शेरनी की दहाड़ ख़त्म नहीं होने वाली ! बेहतरीन लेख !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय सिंह साहब आजकल ऐसे लोग मिलते ही कहाँ हैं जिनकी जुबान से गुड की मिठास टपकती हो, ये शब्द तो ईश्वरीय देन हैं जिनकी कमी भगवान् मेरे पास तो होने नहीं देते परन्तु, हाँ मैं प्रयोग केवल व्यक्ति के अनुसार ही करता हूँ और आप के विषय में गुड और तेली से आगे कुछ लिखना बेकार है शब्दों को व्यर्थ करना होगा ............. ! आर एस एस और तालिबान को सम्बद्ध करके आपने अपने वृहत ज्ञान का प्रदर्शन कर ही दिया है इसका सीधा सा अर्थ है की न तो आप को आर एस एस के विषय में जानकारी है और न ही तालिबान के विषय में ........ अब क्योंकि आपके पास जानकारी का अभाव है तो आप ने अन्ना और रामदेव के विरोध का एक मार्ग पकड़ रखा है न तथ्यों के साथ बात करते हैं न ही तर्कों पर बात करते हैं जब तर्क नहीं कर पाते तो लिख देते हैं की हमें आपके लिखे हुए से एलर्जी है, आदरणीय सिंह साहब हमें आपके लिखे से या आपसे कोई एलर्जी नहीं है ..... ब्लोगिंग एक इसी तरह का क्षेत्र है जहां जब आप अपने विचार रखते हैं तो एक स्वस्थ बहस के लिए तैयार रहें लेकिन आप उस समय ये कह कर पलायन कर जाते हैं की हमें आपसे एलर्जी है ......... कृपया आप जो लिखें उस पर दुसरे ब्लोगर को संतुष्ट करने की जिम्मेदारी आपकी है, आप आइये हमारे मंच पर और कीजिये बहस यकीन मानिए आपको तथ्यों के साथ संतुष्ट करेंगे. बाकी आप समझ आपकी जो समझें ....... धन्यवाद

के द्वारा: munish munish

ये आक्रोश है सिंह साहिब? घर लुट रहा है और आप मुखिया बन कर चुप बैठे हैं तब भी लोग आपको कुछ न कहें? ये अपेक्षा है भारत की जनता से? शर्म आती है हमें हमारे प्रधानमंत्री पर और उनके हिमायती लोगों पर , पर ये कथन गलत होगा. आपकी वय हमसे अधिक है अतः क्षमा चाहता हूँ. किन्तु अगर नहीं बोला तो आने वाली संताने हमें नहीं माफ़ करेंगी जैसे की हम आप की पीढ़ी को माफ़ नहीं कर सकते. खिसियानी बिल्ली आज खम्बा नोच रही है पर कल मुह भी नोच सकती है. रही बात कर्तव्यबोध की आप ही कृपा करके बता दें की हमारा कर्तव्य क्या है? तथा एक निवेदन और है बोग पुराना हो गया है कृपया उत्तर या तो मेरे ब्लॉग पर पेस्ट कर दें या मेल कर दें. धन्यवाद.

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

आदरणीय सिंह साहब, मैंने बीच हस्तक्षेप किया, इसलिए माफ़ी चाहता हूँ, मैंने आपके लेख पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी केवल एक महाभारत कालीन तथ्य रखा था, क्योंकि वो जरूरी था आपके लेख पर मैंने इसलिए टिप्पड़ी नहीं की क्योंकि फिर आपको लगता है की मेरा आपसे कुछ विशेष बैर है...................... ! लेकिन फिर भी आपके कथनानुसार मैं अपने कमेन्ट को पूरा करता हूँ. आज के माहौल में मर्यादाओं की परिभाषा बदल चुकी है राम की मर्यादा महत्त्व केवल रावण जैसे प्रकाण्ड पंडित के समक्ष ही था क्योंकि वो स्वयं मर्यादाओं का आचरण करता था, महाभारत में कृष्ण ने मर्यादाओं में अपने आपको नहीं बाँधा, और धर्म की रक्षा ( उस समय धर्म से तात्पर्य सत्य से था मानवीय मूल्यों से था उन्ही मर्यादाओं से था जो राम के लिए अति महत्वपूर्ण थीं) के लिए साम, दाम, दंड, भेद की पोलिसी अपनाई........! क्योंकि उस काल में दुर्योधन, शकूनी जैसे लोगों के लिए मानवीय मूल्यों का कोई महत्त्व नहीं था.........! यही स्थिति आज की है आप सत्ता में बैठे लोगों को दुर्योधन दुशासन जैसे लोगों से कैसे अलग कर सकते हैं, और उन को उन्ही की भाषा में समझाया जा सकता है इसलिए मर्यादाओं के विषय में अब न ही लिखा जाए तो बेहतर होगा........... ! क्योंकि आज के समाज में मर्यादाओं का कोई मूल्य नहीं बचा है. आप स्वयं बताइये की अंधे ध्रतराष्ट्र से माननीय मनमोहन सिंह जी किस प्रकार अलग हैं.........! आपके विषय पर तो मैंने अपने विचार लिख दिए हैं रही बात विषय पर आपके विचारों की तो वो तो में पहले ही लिख चूका हूँ............ वाही तेली और गुड बेचने वाली कहानी..............! :)

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

आदरणीय sp जी, विनम्रता पूर्वक कहना चाहूँगा कि आप रामदेव या किसी भी देव की भरपूर आलोचना कर सकते हैं किन्तु तथ्य के साथ जैसे मैंने ऊपर तथ्य दिए| रामदेव का पतंजलि ट्रस्ट के रूप में रजिस्टर था अतः कानून के अनुसार टैक्स में उन्हें काफी छूट थी, ४जुन के बाद कांग्रेस ने टैक्स छोटों को रद्द करबा दिया और आपको पता होना चाहिए कि करोड़ों में टैक्स की पाई-पाई जमा की गई.. ये अखबार पढने वाला संन्य व्यक्ति जनता होगा.. फिर भी आप टैक्स चोर कहते हैं..?? टैक्स चोर वो होता है जो टैक्स के लिए गलत आंकड़े पेश कर वो नहीं जो कानून के तहत छूट ले. सभी ट्रस्ट छूट लेते हैं!! खैर!! अभी तो वो भी जमा हो गया अब काहे को टैक्स चोर!! टैक्स चोर तो दिग्विजय सिंह ने भी नहीं बोला... आप सामान्य ज्ञान में चूक कर जाते हैं..!! आप आंकड़ों तथ्यों पे बात करें तो आपको मेरी मनोदशा की चिंता नहीं सताएगी!!! प्रश्न यह है कि आप किसी छोटी सी फुंसी के लिए उन लोगों की हमदर्दी में किस आधार पर अनुरोध कर सकते हैं जोकि खुद ही कैंसर से पीड़ित हैं...!!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

एस. पी. सिंह जी सादर प्रणाम वैसे तो अपने-अपने विचार हैं लेकिन कोई माने या न माने आज हमारे देश में कोई प्रधानमंत्री नहीं है| सभी मंत्री अपने-अपने विभागों के प्रधानमंत्री हैं और एक कमिटी है जो उन्हें हैंडल करती है जिसका नाम है NAC| टीम अन्ना को अगर ध्यान से देखा जाये तो वो भी किसी काम की नहीं| उस टीम का हर सदस्य खुद को अन्ना ही समझता है| अब बात जहाँ तक भाषा की है तो गाली-गलौज किसी समस्या का हल नहीं है लेकिन इस लोकतान्त्रिक सरकार, सर्वोच्च संसद, और "माननीय" प्रधानमंत्री "जी" की शाही प्रतिष्ठा तब धूमिल क्यों नहीं होती जब छटे हुए गुंडे-बदमाश कौंग्रेस के अथवा अन्य दलों के टिकट पर जीत के जाते हैं? जिन्हें जेल में होना चाहिए उनके साथ "माननीय" प्रधानमंत्री "जी" नाश्ता करते हैं| आदरणीय स्वामी रामदेव जी के शांतिपूर्ण आन्दोलन पर रात दो बजे तानाशाहों की तरह से जो कार्यवाही हुई जिसकी निंदा सर्वोच्च न्यायालय ने भी की, उसपर हमारे "माननीय" प्रधानमंत्री "जी" गूंगे क्यों बने रहे? सिर्फ ये लिखा-लिखाया पढ़ देना की "वो जरूरी कदम था" उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई? उनकी पार्टी कौंग्रेस ने एक असंतुलित मस्तिष्क वाले को छुट्टा छोड़ रखा है पागलपन से भरे बयान देने के लिए, उसमें "माननीय" जी की प्रतिष्ठा धूमिल नहीं होती? ये सब कुछ सवाल हैं जो मन में उठते हैं......

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

प्रिय योगी जी आपकी सारी बातें सही हो सकती है क्योंकि यह आपका विचार है ? न तो मैंने किसी को बेदाग़ या उज्जवल चरित्र का कहा है जो जैसा है वैसा ही कहेंगे लोग ? लेकिन लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है की आप अगर किसी आन्दोलन का नेतृत्त्व कर रहे है तो आप अतिउत्साह में अमर्यादित हो जाएँ क्योंकि ऐसा कहा जाता है की जो आज आप बोयंगे वही आप काटेंगे भी, ऐसा नहीं हो सकता की बबूल का पेड़ लगा कर आप को वह पेड़ आम का फल देगा . आन्दोलन और सरकारों का आना जाना सतत चलता रहेगा क्योंकि यह लोकतंत्र का नियम है और जरूरी भी है लेकिन मर्यादाओं का पालन हमारी सांस्कृतिक विरासत है जिसको संभाल कर रखना और संजोना वर्तमान पीढ़ी के नेताओं और आन्दोलनकारियों का परम कर्तव्य है जिसका पालन बिना किसी नियम और कायदे के भी किया जाना जरूरी है और वाणी पर सयंम उससे भी जरूरी है ऐसा मेरा अनुरोध है ? क्योंकि हम जो कुछ भी आज कर रहे है वही हमारी भावी पीढ़ी के लिए आचार संहिता बन जायगा ? और न ही इन छिछोरी बातों से सत्ता परिवर्तन होगा सत्ता परिवर्तन निर्वचान के मतदान से होगा जो जनता की ताकत है ? आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यावा.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

आदरणीय sp जी, एक बात बताइये कि जब मुख्तार अंसारी मंत्री बनता है तब क्या उसे गुंडा कहना बंद कर देना चाहिए...?? लालू या अमर सिंह अगर कल जोड़तोड़ की राजनीति में प्रधानमंत्री बन जाएँ क्योंकि इस देश में लोग बिना चुनाव लड़े भी पीएम बन जाते हैं तो क्या उन्हें चारा चोर अथवा दलाल कहना गलत हो जाएगा..?? क्या अबु सलेम को मंत्री बना दिये जाने पर उसकी आतंकवादी की हकीकत बदल जाएगी?? ऐसी हालत में उन्हें उनकी असली पहचान से संबोधित करना और भी आवश्यक हो जाता है अन्यथा देश और संविधान की आत्मा रोती रहेगी.... रही बात मर्यादा की तो जब कॉंग्रेस के एक प्रवक्ता अन्ना को चोर कहते हैं अथवा एक बदनाम महासचिव रामदेव को ठग कहते हैं तब कोंग्रेसियों के पेट में उठने वाला यह मर्यादा की ऐंठन कहाँ चली जाती है?? तब बड़ी मम्मी कौन सी दवा दे देती हैं..?? जब कोंग्रेसियों की बड़ी मम्मी 2007 में खुद गुजरात जाकर संसदीय संवैधानिक मर्यादा का दाह संस्कार करती हैं तब सभी बुद्धिजीवियों द्वारा आलोचना के बाद भी उन्हें माफी मांगने शर्म क्यों आती है...??? बबलू जब up चुनाव में एक पार्टी का घोषणापत्र मंच पर खड़े होकर फाड़ता है तब मर्यादा क्या इटली की शैर पर गई होती है...??? ऐसे कहाँ तक गिनाऊँ मैं?? इन बिन्दुओं पर भी सोचिएगा...!!!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीय  सिंह साहब अगर प्रशांत  भूषण  इन मामलों में दोषी हैं तो उन्हें  निश्चित  ही सजा मिलनी चाहिये। सरकार को सीबीई जाँच  करवानी चाहिये। किन्तु यह कहना कि तुमने भी भ्रष्टाचार  किया है, अतः तुम्हें भ्रष्टाचार का विरोध  करने का अधिकार नहीं है। मेरा मानना है कि आम आदमी के भ्रष्टाचार  से नेताओँ का भ्रष्टाचार ज्यादा  खतरनाक  होता है। क्योंकि उनका भ्रष्टाचार  हमारा रोल  मॉडल  बनता है। आम  आदमी सोचता है कि जब इन्हें सजा नहीं मिली तो हमें भी नहीं मिलेगी, हम भी बच जायेंगे। मैं व्यक्तिगत  रूप से न  तो अन्ना का न  अन्ना टीम  का और न ही बाबा रामदेव  का समर्थक  हूँ। किन्तु उनके उद्देशों  का समर्थन  करता हूँ। मुझे लगता है कि यह उनका आन्दोलन  नहीं अपितु मेरा आन्दोलन  है। मैं केवल  सोचता रहा और उन्होंने ने उसे कार्यरूप में परिणित  कर दिया। अगर प्रशांत भूषण  या उनके पिता ने कोई भ्रष्टाचार  किया है तो इसमें उनसे अधिक दोष व्यवस्था का है। जिसका निर्माण  इन  नेताओं ने किया  है। जब तक  व्यवस्था  नहीं बदलेगी, सरकार बदलने से कुछ  नहीं होगा।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

भाई संतोष जी ऐसा कतई न समझें मैं बुरा नहीं मानता यह तो विचारों का आदान प्रदान है, क्योंकि मेरा अपना यह विचार है अगर आप समाज का नेतृत्त्व कर रहे है या करने जा रहे है तो आपका दमन भी साफ़ होना चाहिए और आचरण भी मर्यादित हो तो अच्छा है अन्यथा जो शासन कर रहे है और जो शासन करने की कतार में है अगर उनमे फर्क नहीं होगा तो हमें बदलाव की जरूरत क्यों होनी चाहिए/ चूँकि मेरी नजर में यह केवल राजनितिक परपंच के अतिरिक्त कुछ नहीं है. क्योंकि पिछले ६५ वर्षो में जैसा भी शासन रहा है उसका महत्त्व इस बात से बढ़ जाता है की हमारे देश में satta परिवर्तन बिना किसी हिंसा के केवल मतदान के द्वारा ही होता रहा है ? इस लिए जनता को हिंसा की राह पर मोड़ने का कार्य अगर न ही किया जाय तो देश हित में होगा क्योंकि मेरा यह भी मानना है की आन्दोलन और हिंसा से सम्पति का को नुक्सान होता है वह जनता का ही नुक्सान होता है. ? धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

भाई दिनेश जी प्रणाम, मेरा आशय ऐसा नहीं है जैसा आप सिद्ध करने की कोशिस कर रहे हो, क्योंकि मैं उन शब्दों को यहाँ दोहराना नहीं चाहता अपितु मैंने यह कहा है प्रधान मंत्री जो देश का प्रतिनिधित्व करता है उसके लिए अमर्यादित शब्दों का प्रयोग अगर न किया जाय तो उचित ही होता ? इस लिए यह शब्द आप अपने पिता श्री के लिए नहीं प्रयोग कर सकते तो दूसरों के लिए क्योंकर, क्या आपको पता है आपके पिता श्री ने दस वर्षों की कमाई केवल एक सौ दस करोड़ रुपया होना बताया था तो यह कमाई क्या किसी धार्मिक कृत्य से या कीर्तन करने से प्राप्त हुई थी इसमें कितना पैसा इमानदारी की कमाई का है जरा देश को हिसाब लगा कर बताएं — और इलाहबाद में जो स्टाम्प चोरी के केश में आपके पिता श्री पर एक करोड़ ३४ लाख का जुर्माना लगा है वह भी क्या कोई धार्मिक कृत्य है आपके परिवार को ताज कारीडोर के मुकद्दमे के फलसरूप जो १०-१० हजार वर्ग मीटर के नॉयडा में कम कीमत पर जो दो प्लाट मिले है वह भी कोई धार्मिक कृत्य है क्या यह भ्रष्टाचार की श्रेणी से परे है परन्तु आप चाह कर भी कुछ नहीं बोल सकते क्योंकि आपको और आपकी टीम को अपने किसी गुप्त आका के लिए केवल परीक्षा पास करनी है ? आन्दोलन और सरकारों का आना जाना सतत चलता रहेगा क्योंकि यह लोकतंत्र का नियम है और जरूरी भी है लेकिन मर्यादाओं का पालन हमारी सांस्कृतिक विरासत है जिसको संभाल कर रखना और संजोना वर्तमान पीढ़ी के नेताओं और आन्दोलनकारियों का परम कर्तव्य है जिसका पालन बिना किसी नियम और कायदे के भी किया जाना जरूरी है और वाणी पर सयंम उससे भी जरूरी है ऐसा मेरा अनुरोध है ? लेकिन आप हैं की शिखंडी शब्द को ही पकड़ कर बैठ गए आपको इन बातो पर भी टिप्पणी करनी चाहिए थी< धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

आदरणीय  सिंह साहब, नमस्कार। प्रशांत  भूषण  ने मनमोहन जी को शिखंडी नहीं कहा, अपितु शिखंडी की तरह कहा है जो शायद  उनका अपमान नहीं है। हाँ क्राँगेस  पर व्यंग  जरूर है। फिर  शिखंडी ने कोई ऐसा अधार्मिक कार्य  या कुकृत्य  नहीं किया था कि मनमोहन जी के साथ  उनका  नाम  जुड़ने से उन्हें अपमानित  होना पढ़े। इनके मनीष , बेनी, दिग्गी आदि की भाषायें देखिये। जहर से बुझी होती हैं, तब कोई सवाल  नहीं उठाता। संसद खामोश  हो जाती है। और हम कुछ  बोल  दे तो पूरी संसद एक  जुट  हो जाती है। शिखंडी ने तो धर्म  की रक्षा की थी, वह तो पाण्डवों अर्थात  धर्म  के साथ  था लेकिन  यहाँ पर तो शिखंडी ही कौरवों का मुखिया बना बैठा है। मेरी दृष्टि में शिखंडी सम्मान सूचक  शब्द है।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय सोहन पाल सिंह जी सादर नमस्कार, इस बात में कोई दो राय नहीं है की प्रशांत भूषण द्वारा सरदार जी को शिखंडी कहा जाना पूर्ण रूप से निंदनीय है इससे उनमे और तुममे क्या फर्क रह जाएगा? आलोचना के लिए शब्दों की कोई कमी नहीं है. मै ये नहीं देख पाया की किस अवसर पर उन्होंने यह कहा. क्योंकि ऐसी ही घटना शरद पवांर के लिए अन्ना द्वारा अनौपचारिक बयान पर भी हो गयी थी. यदि ऐसा है तो मुझे बहुत नहीं कहना किन्तु यदि यह औपचारिक बयान है तो फिर जैसा की मैंने कहा है अवश्य ही निंदनीय है. पिछले कुछ दिनों से टीम में भटकाव देखा जा रहा है. शायद आन्दोलन को आशातीत सफलता नहीं मिलने से खिन्नता में कुछ गलत कदम उठ रहे हों. किन्तु एक अच्छे कार्य के लिए लड़ना है तो लड़ाई लम्बी भी होगी और ऐसे वक्त संयम की भी आवश्यकता होगी. देखते हैं कितना संयम रख पाते हैं टीम के कर्णधार.

के द्वारा: akraktale akraktale

भाई संतोष जी इतनी कटुता किस काम की, न न करते हुए भी आप अपने विचार प्रकट कर ही बैठे आखिर क्यों. भाई संतोष जी मैंने किसी आन्दोलन कारी को  निहत्था कहीं भेजने की वकालत नहीं की है भारतीय परम्परा में रहने की प्रार्थना ही की है और उनको अपने और अपने परिवार के आचरण का आइना दिखाने की कोशिस की है लेकिन आपका आक्रोश समझ से परे है क्योंकि ब्यान की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप प्रशांत भूषण का विरोध / आलोचना हो रही है जिसके परिणाम स्वरुप अभी २ बजे के समाचारों में शांति भूषण अपने कल के ब्यान से पलट गएँ हैं यानि थूक कर चाट लिया है / वैसे भी आप का कथन की शिखंडी धर्म के काम आया था गलत है शिखंडी स्वयं धर्म युद्ध लड़ रहा था काम आने का मतलब होता है शहीद होना इस लिए शाब्दिक अर्थ हुआ की टीम अन्ना स्वयं ही अन्ना को आगे रख कर जो आन्दोलन कर रही है उसकी भी विश्विनियता का पैमानन स्वयं में ही डगमगा रहा है इसी लिए उलटे सीधे ब्यान बाजी हो रही है क्योंकि आन्दोलन का जो स्वरूप था उसका ह्रास हो चूका है बाकी आकलन करने के लिए आप स्वयं सक्षम है ? टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

आदरणीय सोहनपाल जी सादर नमस्कार, आपकी बातें सही है जैसा की आपने कहा है की जब तक अन्ना जी का आन्दोलन चल रहा था लगता था बस देश से भ्रष्टाचार ख़त्म ही होने वाला है मगर आन्दोलन के एक भाग की समाप्ति के बाद ही हम सच्चाई से वाकिफ हो गए. बस उसी तरह आमिर के कार्यक्रम का भी हश्र है. आपने सही कहा है की देश में कई समस्याएं हैं और सबसे ज्वलंत समस्या है जनसंख्या विस्फोट. अवश्य ही आमिर को इस विषय पर भी एक एपिसोड लाना चाहिए कोई धर्म आड़े नहीं आ रहा है सिर्फ कुछ मुल्ला मौलवियों से तकरार बढ़ेगी और फिर सब शांत हो जायेंगे. क्योंकि हकीकत वे भी जानते हैं. प्रतिक्रया लम्बी हो जायेगी वरना मै वे साड़ी बातें रखता जिससे की मालुम होता की सरकार का ही दोगलापन आज इसके लिए दोषी है. आपके आलेख पर मेरी सहमति है की आमिर ने जब बीड़ा उठाया ही है और अच्छी कमाई भी कर रहे हैं तो इन ज्वलंत मुद्दों पर भी कार्यक्रम तैयार करें.

के द्वारा: akraktale akraktale

किसी को भी राष्ट्रपति बनाओ क्या फर्क पड़ता है??? राष्ट्रपति तो इनाम का पद है जिसने भी कांग्रेसी सरकार के चोरी के काम में साथ दिया या चुप्पी साधी उसी को मिलेगा ये पद …. राष्ट्रपति पद एक ऐसा कन्धा है जिसके कंधे पे रखकर सरकारें बन्दूक चलती हैं…. अब प्रतिभा देवी सिंह को ही लीजये पता नहीं कहाँ पे परांठे बेल रही थी, बुला लाये कांग्रेसी उनको राष्ट्रपति पद के लिए…क्या कर लिया मोहतरमा ने??? सुना है बहुत से देशों के यात्रा का उनका खर्चा लगभग २०५ करोड़ हुआ है.. ये हाल यहाँ के राष्ट्रपति के…… काम के कुछ नहीं खर्चे पे खर्चे !!!!!!! ये बेमानी बहस है कौन बनेगा राष्ट्रपति …… क्या कर लेगा इस देश का वो कठपुतली??? जब एक प्रधानमंत्री खुद कठपुतली हो तो राष्ट्रपति क्या कर लेगा???? आपने देखा है सिंह साब की श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रपति के पद की गरिमा को कितना बनाये रखा है ? उनके हर विदेशी दौरे में १०-२० पारिवारिक सदस्य जरूर होते हैं ! शायद ये पहला मौका था जब उन्हें स्वयं ये सफाई देनी पड़ी की क्यों उनके दौरे में इतने परिवार के सदस्य होते हैं ! यानी फुल मज़े का पद ! बस मुहर ही तो लगनी है , करना क्या है ? तो फिर किसी को भी बिठा दो ? हमारे यहाँ के चौराहे पर जो मोची बैठता है वो क्यों नहीं , सिर्फ इस वज़ह से की सोनिया उसे नहीं जानती ? चलो वो उनकी किचन में काम कर लेगा फिर शायद उसका नंबर लग जाए ! आपने लिखा है की गैर राजनीती व्यक्ति राष्ट्रपति बने तो बेहतर ! कैसे ? क्या उस पर कांग्रेस द्वारा चुने जाने का दबाव नहीं रहेगा ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

किसी को भी राष्ट्रपति बनाओ क्या फर्क पड़ता है??? राष्ट्रपति तो इनाम का पद है जिसने भी कांग्रेसी सरकार के चोरी के काम में साथ दिया या चुप्पी साधी उसी को मिलेगा ये पद .... राष्ट्रपति पद एक ऐसा कन्धा है जिसके कंधे पे रखकर सरकारें बन्दूक चलती हैं.... अब प्रतिभा देवी सिंह को ही लीजये पता नहीं कहाँ पे परांठे बेल रही थी, बुला लाये कांग्रेसी उनको राष्ट्रपति पद के लिए...क्या कर लिया मोहतरमा ने??? सुना है बहुत से देशों के यात्रा का उनका खर्चा लगभग २०५ करोड़ हुआ है.. ये हाल यहाँ के राष्ट्रपति के...... काम के कुछ नहीं खर्चे पे खर्चे !!!!!!! ये बेमानी बहस है कौन बनेगा राष्ट्रपति ...... क्या कर लेगा इस देश का वो कठपुतली??? जब एक प्रधानमंत्री खुद कठपुतली हो तो राष्ट्रपति क्या कर लेगा????

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

आदरणीय सिंह साहब नमस्कार, रहीम ने यह दोहा बरसों बरस पहले ही लिख दिया था किन्तु दुर्भाग्य से मानव आज भी उसका सही अर्थ समझ ही नहीं पाया. पानी के प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने से मानव ने कभी उसकी महत्ता को जाना ही नहीं. आज जब नदियाँ सूखने लगी हैं, जमीनी जलस्तर नीचे जाने लगा है और इंसान को पानी का आभाव नजर आने लगा है तो वह पानी के बारे में सोचने को विवश हुआ है. इन परिस्थितियों के लिए मै सरकार से अधिक समाज को ही दोषी मानता हूँ जिसने धर्मांध होकर आखें मूंद रखी हैं और नदियों, तालाबों को प्रदूषित कर रहा है. विभिन्न उद्योगों द्वारा अपशिष्ट बहाकर नदी में मिलाने पर कभी जनता द्वारा कोई बड़ा आन्दोलन ना होना भी समाज की उदासीनता को दर्शाता है. शवों को जलाने के मामले में कम से कम हमारे यहाँ जैन समाज तो जागरूक हुआ ही है उनके द्वारा अब शव दाह के लिए विधुत शवदाह गृह का ही उपयोग किया जाता है जिससे ना ही नदी प्रदूषित होती है और ना ही लकड़ी की आवश्यकता होती है. आपने एक अच्छे मुद्दे पर ध्यान आकर्षित किया है बधाई.

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आदरणीय सिंह साहब सादर, मै आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ कि तीसरे के पीछे भी डंडा ले कर खड़े रहना पडेगा क्योंकि दूध का जला छांछ भी फूंक फूंक कर पीता है.किन्तु मुझे कई बार लगता है कि इतने बड़े कार्य में छोटे छोटे विघ्न तो आयेंगे ही. यदि हम इनसे भ्रमित होते रहे तो मुख्य कार्य किस तरह से पूर्ण कर पायेंगे. आप सही कह रहे है ये तो शुरुआत है कई लोगों का तो कहना है कि यह सिर्फ स्वप्न है. क्योंकि उन लोगों का मानना है कि कोई नियम बन जाने से सुधार नहीं होता जब तक उसे ठीक से लागू करने वाली संस्था ठीक ना हो.बात सही है किन्तु आज अक्सर देखने में आता है जब भी किसी सख्ती कि बात आती है तो मालुम होता है कि क़ानून ही कमजोर हैं. कम से कम जब कोई लागू कराने वाली संस्था मजबूत होगी उस दिन इस बात का रोना तो नहीं होगा कि क़ानून कमजोर हैं. इसलिए मेरी द्रष्टि में सर्वप्रथम मजबूत क़ानून या मजबूत लोकपाल जरूरी है. इसलिए इस मार्ग में छोटी मोटी बाधाओं को मै नजरअंदाज करना ही उपयुक्त समझता हूँ. क्योंकि यह हकीकत ना हो कर षड़यंत्र भी हो सकता है.

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एस पी सिंह जी दुबारा आने के क्षमा/ चूहे बिल्ली के खेल तो जनता व् सरकार के बीच चलते रहते हें / ये चूहा बड़े काम का हें / कम्पूटर में भी एक चूहा हें / खैर एक कहानी हमने भी पढी थी - एक बार एक चूहा नींद में सोये शेर के ऊपर उझल कूद कर रहा थे ठीक उसी एक जानी मानी टीम की तरह / शेर नींद से जागा व् चूहे को पंजों में दबा लिया / चूहा बोला शाहब मुझे यदि आप छोड़ दें तो में आपके किसी दिन काम आउंगा / शेर ने अनमने मन से चूहा को छोड़ किया कि ये निरह जीव क्या मेरे काम आयेगा / संयोग से एक दिन शेर शिकारी के जाल में फंस गया / वो चिल्लाने लगा / उसकी करुण आवाज सुन चूहा आया व् जाल को काट चूहें को आजद कर दिया / कभी कभी छोटी चीज भी काम आ सकती हें / इस लिए चूहे को शेर का व् शेर को चूहे का सम्मान करना चाहिए / नहीं तो दोनों का अस्तित्व खतरे में पड सकता हें / एक बार फिर अच्छी पोस्ट के लिए धन्यवाद

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आदरणीय बंधुवर आपका आरोप सौ प्रतिशत सही है, शायद मेरे सोंचने और आपके आरोप में बहुत थोडा सा अंतर है जो लोग गलत है उसकी आलोचना तो सभी स्तरों पर होती है लेकिन मैंने भी गलत को कभी सही कहने की जुर्रत नहीं की है गलत को गलत कहने बताने वालों का आचरण भी अगर वैसा ही है तो फिर दोनों में अंतर कैसा, फिर क्या मैं ऐसे लोंगो की आरती करूँ ? या जो स्थापित चोर लुटेरे, भ्रष्टाचारी है केवल उनके ही विरुद्ध लिखूं , क्या आज गलती करने वाले ऐसे लोगों को कल हम और आप भी हाथ में डंडा लेकर समझाने जायंगे शायद मेरे लिए ऐसा करना संभव नहीं है ? वैसे अगर आप सही बात को चटखारा लेकर लिखना समझते है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं बंधुवर आपके सुझाव पर जरूर गौर करूँगा ? परन्तु एक सत्य आपसे जानना चाहता हूँ की कृपया आप यह बताएं की मैं कौन से तथ्य गलत लिख रहा हूँ ? आपका धन्यवाद. http://sohanpalsingh.jagranjunction.com/2012/04/27/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%83-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ad%e0%a4%b5/ एक लिंक भेज रहा हूँ उसके बाद !!!!!!!!!!!!!!! अलविदा !!!!!!!!!!!!!!!

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आदरणीय सिंह साहब नमस्कार, आपका गणितीय फार्मूला बिलकुल सही है. किन्तु मै ये नहीं कह रहा हूँ की आपकी हर बात सही है. क्योंकि सबका देखने देखने का नजरिया है. आपको कभी अभिषेक मनु संघवी पर लिखने का मन नहीं करता होगा. आपका कभी कौशिक बसु के बयान पर लिखने का मन नहीं होता होगा किन्तु जब आपको अन्ना टीम की चिंदी भी मिल जाए तो आप बड़े चटखारे ले कर इसे लिखते हैं इसे क्या आपका सत्य के प्रति प्रेम कहूँ या की आपका पूर्वाग्रह ग्रसित होना कहूँ. आपके घर में भी सबको स्वतंत्र विचार रखने की अनुमति हो सकती है किन्तु क्या आप चाहेंगे की आपके घर में अभिव्यक्त की हुई बात पडोसी को भी सुनायी जाए. यदि कोई गलती करता है तो सजा तो मिलनी ही चाहिए. इसमें कोई बुराई नहीं.

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प्रिय भाई सतीश जी आपने देर से ही सही मना है i अगर वास्तव में टीम अन्ना की बात की जाय तो टीम अन्ना एक प्राइवेट लिमिटिड कंपनी से अधिक कुछ नहीं है यह केवल टी.वी. के शेर है और वैसे भी अगर अन्ना को टीम से अलग करके देखा जाय तो उसके बाद टीम के पास क्या बचता है केवल एक बड़ा सा जीरो (शुन्य ) चूँकि इनका कैनवास इतना छोटा है की उसमे पुरे देश में केवल एन० सी ० आर० का क्षेत्र समा पाता है उससे आगे इनको कुछ नजर ही नहीं आता, मुझे तो ऐसा भी लगता है की यह लोग अगर अन्ना हजारे की लोकप्रियता को इसी प्रकार भुनाते रहेंगे ( समय बे समय अनशन पर बैठा कर ) तो भ्रष्टाचार की विरुद्ध जो कथित अभियान ने एक गति पकड़ी थी उसकी असमय ही समापन न हो जाय, मैं यहाँ कारण भी स्पष्ट कर दूँ. पहला यह की अन्ना हजारे किसी इन्डिय अगेंस्ट करप्शन के संस्थापक मेम्बर नहीं है उनको उनकी लोकप्रियता के कारण इस संस्था के डैरक्टर केजरीवाल के द्वारा जोड़ा गया है और यह टीम केवल उनका उपयोग ही करती है ? इसके प्रमाण में आपको एक तथ्य बताना चाहता हूँ, अगस्त २०११ के १३ दिन के आन्दोलन के दौरान जो रुपया एकत्र हुआ उसका विवरण वेव साईट पर उपलब्ध है जिसमे ३०/९/२०११ कुल २,५१,९९,०७८/- दान /चंदे के रूप में मिला जिसमे से १,५७,४९,०३८/ खर्च होना बताया गया है बाकि का ९४,५०,०२०/- रुपया एक संस्था जो कजरीवाल की निजी NGO है उसमे जमा किया गया है अब अगर आन्दोलन अन्ना का है तो पैसा केजरीवाल का कैसे हो गया और जो खर्च बताये गए है वह अपने आप में अपनी कहानी कह देते है ? इसलिए मेरा यह मानना है की यह आन्दोलन दिशा हीन हो चूका है इनकी केवल और केवल इच्छा यह थी की किसी तरह से जनता इनको जान जाए और जब भी यह चुनाव लड़ें और जीत जाय यह कितना भी कहे की यह चुनाव नहीं लड़ेंगे आखिरी मुकाम वहीँ होगा, क्योंकि आज करप्शन से अधिक मिलावट खोरों के विरुद्ध आन्दोलन की जरूरत क्योंकि जिस गावं में इतने दुधारू जानवर नहीं है जितना दूध का उत्पादन उस गावं से होता है ?

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सिंह साहब आपने जिस प्रकार से टीम अन्ना का गणित समझाया हें वो वहुत ही कामल का हें / आज टीम अन्ना की अपनी राजनैतिक मह्त्वाकान्शा हें / सब मिलकर टट्टी ( ठंडा करने वाली फुंस की दीवार ) की आड़ में शिकार कर रहें हें / केजरीवाल जी अपने को तीसमारखां समझतें हें तो मनीष सिसोदिया भी उसी तरह का व्यव्हार करते हें / एक कवि महोदय ( कुमार विश्वास )पढ़ना छोड़ टी वी किसी भी व्यक्ति को अपने से बड़ा नहीं समझते / किरण बेदी , प्रशांत भूषन जी सभी देश व् समाज से ऊपर समझते हें / इनका एक सूत्रीय कार्यकर्म हें जन लोकपाल / लगता हें ये वो पैन्स्लिन का इंजेक्शन हें जिसके लगाते ही सारे रोग दूर हो जायेगें / इन लोगों को काफी चंधा समाज सेवा के नाम पर मिलता हें / पर कितनी सेवा करते हें ये तो ये ही जाने / लोगों की शिक्षा पर , चिकित्सा पर ये शायद ही खर्च हों / आम आदमी की रोजमरा जिन्दगी से इन्हें शायद ही सरोकार हो / मुझे ये लगता हें कि ठीक ये इस प्रकार व्यवहार कर रहें हें/यानी के टीम अन्ना की लंका में सब बावन गज के हें / आप का तर्क सही हें कि यदि टीम में अन्ना न हो तो टीम का अस्तित्व ही नहीं हें / बिना अन्ना के राम लीला मैदान कितना सूना था ये टीम अन्ना ने भी देखा हें

के द्वारा: satish3840 satish3840

आदरणीय शशि भूषण जी एवं दिनेश कार्तिक जी सादर प्रणाम, पोस्ट में मैंने अपने ओर से कुछ नहीं कहा है जो घट रहा है वह सब के सामने है रही नकारात्मक सोंच की तो यह तो मनुष्य की प्रवृति है कुछ तो सोंचेगा ही ? रही बात धार्मिक कुरीतियाँ/ भ्रष्टाचार / जाति प्रथा / यह सब तो हैं और इसके जिम्मेदार भी वही लोग हैं जो समाज के लीडर थे (वर्ण व्यस्था के जनक ) मेरा तो यह मानना है कि इन सब का कारण केवल एक है वह है मनुष्य का चरित्र जिस प्रकार से व्यक्ति जाती प्रथा/धार्मिक क्रिया कलाप का पालन दृढ़ता से करता है और गैर जाति के विवाह करने पर अपने जवान बच्चों को मौत के घाट उतर देता है अगर वाही दृढ़ता अपने प्रतिदिन के कार्य में लागू करे तो न तो भ्रष्टाचार होगा और न कोई कुरीतियाँ पनपेगी / वैसे भी धर्म एक आस्था का विषय है मैं तो इस विषय पर अज्ञानी ही हूँ ? हाँ मेरा मानना है कि अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक कार्य में लिप्त है तो उसका चरित भी उज्जवल ही होना चाहिए जिससे उसके अनुयायी भी लाभान्वित हो. अन्ना इस कसौटी पर खरे उतरते है उन्होंने जो कार्य जपने गाँव रालेगन सिद्दी में किया वह अपने आप में एक उदहारण है , परन्तु बाकी लोग जैसे है मैं उन्हें न तो चरित्रवान मानता हूँ और न ही आगे मान सकूंगा, दोनों बंधुओं से ही कहना चाहता हूँ कि भारत एक बहुत बड़ा देश है जिसकी जनसँख्या १२५ करोड़ के लगभग होगी, तो क्या आप मानते है कि भ्रष्टाचार केवल दिल्ली और उसके एन सी आर क्षेत्र में फैला हुआ है और क्या केवल केंद्र कि सरकार ही भ्रष्टाचार कर रही है बाकी क्षेत्र में (राज्यों में सब राम राज्य है ) शायद नहीं ? आज देश में जितना प्रदूषण है उससे कोई इनकार कर सकता है ? मिलावट का जो कारोबार हो रहा है व शायद दुनिया में कहीं नहीं है जितने जानवर किसी गाँव में नहीं उससे अधिक दूध बाजार में उपलब्ध है ? इसलिए अग्रिम क्षमा याचना के साथ मैं तो केवल इतना ही कह सकता हूँ कि देश के प्रत्येक व्यक्ति को अपना दृष्टि कोण बदलना होगा, और सबको किसी भी लड़ाई के लिए तैयार होना होगा और अपने विजन का दायरा भी बढ़ाना होगा क्योंकि संकुचित मानसिकता से कुछ नहीं हो सकेगा (जैसे कि दिल्ली के हुक्मरानों को उखाड़ फैंकने से इस देश कि दशा सुधर जायगी मैं ऐसा नहीं मानता ) इस लिए अन्ना कि टीम के कार्य सब चोंचले लगते है ? यह केवल एक राजनितिक लाड़ाई है अगर हम इसे उनके लिए ही छोड़ दे तो उचित ही होगा, क्या शासन व्यस्था बदलने से भ्रष्टाचार समाप्त होगा मैं ऐसा भी नहीं मानता ? आप दोनों महानुभावों का धन्यबाद.

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प्रिय योगेश जी प्रथम तो मैंने आपकी ही बातों का ही जवाब दिया है इतिहास का सन्दर्भ आपने ही लिया है मैंने केवल आपको सुझाव दिया था क्योंकि आपने लिखा है --"इतिहास में राजनेताओं का महिमा मंडन के बजाय वास्तविक अध्ययन होना चाहिए.. उनके अच्छे कर्मों और भूलों से हमें सीखना चाहिए…" इस लिए मैंने कहा क्योंकि गाँधी राजनेता नहीं थे वह एक सामाजिक कार्यकर्ता के समान थे / इसलिए अगर इतिहास की बात की जाय तो उससे पहले का इतिहास भी पढ़ना चाहिए, रही बात एक गाँधी जी द्वारा की गई गलतियों की, तो गाँधी जी ने जो गलतियाँ की या नहीं की उसके लिए कानून ने नहीं कुछ स्वयंभू हिन्दू हित के रखवालों ने उनको सजा के तौर पर बिना किसी मुकद्दमे और सुनवाई की औपचारिकता किये बगैर हत्या कर दी थी ? क्या इस प्रकार से की गई ह्त्या के आप समर्थक है शायद नहीं होंगे ? अब मैं आपकी बात का उत्तर दे ही नहीं रहा हूँ बल्कि आपको चुनौती भी दे रहा हूँ की मेरी जानकारी के लिए आप ही विस्तार से बता दो की गाँधी जी ने कौन कौन सी गलतियाँ या अपराध किया था या किस अदालत ने किस आयोग ने या किस संस्था ने उनकी गलतियों का आकलन किया था और उनको अपराधी ठहराया था , रही बात कांग्रेस की या किसी और राजनितिक पार्टी की तो मैंने किसी का नाम नहीं लिया है और न लेना चाहता हूँ - मेरी पीड़ा ये है की जो व्यक्ति सुख चैन का जीवन छोड़ कर जीवन भर पूरी मानवता के लिए संघर्ष रत रहा / जिसने हिंसा से दूर रहने का मूल मन्त्र उस समय के काल खंड के अनुसार व्यक्तियों में प्रचारित किया जो शायद समय की मांग थी वैसे भी मृत्यु के बाद किसी बदमास से बदमास व्यक्ति को भी बदनाम नहीं किया जाता परन्तु कुछ लोग आज ६५ वर्ष बीत जाने के बाद भी गाँधी को चैन नहीं लेने दे रहें है क्या यह राजनितिक स्वार्थी प्रपंच नहीं है इससे कौन इनकार कर सकता है ? तीसरी बात यह की अंहिंसा की बात केवल गाँधी जी सन्दर्भ में की थी न की इतिहास के सन्दर्भ वह एक विस्तृत विषय है इस लिए तार्किक विचार विमर्श केवल सन्दर्भ तक सिमित हो तो आनंद भी आता है और ज्ञान भी बढ़ता केवल तर्क के लिए इतिहास की बात नहीं करने में ही भला है -- धन्यवाद सहित ?

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आदरणीय सोहन जी मुझे ये नहीं पता कि आपने किस सन्दर्भ में मुझे इतिहास पढने कि सलाह दी है.. मुझे ये नही पता कि किस दृश्य कि पीड़ा आपके मन में अभी भी है.. हमारा विश्लेषण केवल इतना है गांधीजी ने इतिहास में भूलें की और भविष्य में इस तरह की भूल न हो....अगर आप मुझे मुग़ल कालीन इतिहास पढने कि सलाह दे रहे है तो मैं बता दूं कि उस काल में हुई भूलों पर हम लम्बा विश्लेषण कर सकते हैं.. मैं मूलतः इतिहास का छात्र तो नहीं हूँ मगर ऐतिहासिक घटनाओं और भूलों पर अक्सर विश्लेषण और समीक्षा में रूचि रखता हूँ..इसका कारण ये है कि इतिहास कि भूलें हमें कुछ सिखाती है.. मैं गाँधी जी के अहिंसा वादी नीति का धुर विरोधी नहीं हूँ.. मगर मेरे अब तक जानकारी और अनुभव से मुझे यही लगता है कि गलत नीतियों और दुसरे कि जंगली हिंसा का जवाब भी अहिंसा से नहीं दिया जा सकता है... बहुत अधिक अहिंसा का दिखावा कभी डरपोक या कायरता का आवरण बन जाता है.. अगर पिछले हज़ार साल के इतिहास का विश्लेषण करें तो आप पाएंगे भारत हज़ार साल से गुलाम रहा है मुस्लिम आक्रमणकारियों का .. बहुत कुछ खोया है अपनी अहिंसा नीतियों के चलते.. डरपोक समझे गए हैं. विश्व कि नज़र में हिन्दुस्तानी... राजनीती कहीं की भी हो वो तर्क पर आधारित नहीं होती केवल निजी स्वार्थ और फायदे के लिए होती है.. और हम लोग उन सब का तार्किक विश्लेषण करते रहते हैं.. और उनका तर्क पूर्ण हल निकालने की कोशिश करते रहते हैं... जबकि वो हर बार सही नहीं होता ..अपने फायदे के लिए लोग आपके तर्क पूर्ण बातें नहीं सुनते हैं.. और आप आक्रोश और गुस्से से भरे रहते हैं... बहुत से लोग दबंगई और ताकत से अपनी बात मनवाते हैं.. कुछ लोग इन परिस्थितियों को बस झेलते रहते हैं.. इन सब परिस्थितियों में अगर राजनेता डर(अपनी सत्ता खोने या और किसी भी प्रकार का..) या किसी का तुष्टिकरण के चलते कोई गलत निर्णय ले लेता है.. तो वो आने वाले समय के लिए दंश बन जाता है.. इतिहास में राजनेताओं का महिमा मंडन के बजाय वास्तविक अध्ययन होना चाहिए.. उनके अच्छे कर्मों और भूलों से हमें सीखना चाहिए... आभार सहित...

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar